बाड़मेर के गिरल लिग्नाइट पावर प्रोजेक्ट पर पिछले 25 दिनों से जारी श्रमिकों के आंदोलन में शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी की एंट्री ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है।
रेगिस्तान की तपती रेत और धूल भरे गुबार के बीच शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी, एक बार फिर चर्चाओं में है। लेकिन इस बार चर्चा किसी भाषण की नहीं, बल्कि उनके संघर्ष की है। पिछले कई दिनों से गिरल लिग्नाइट माइन्स (RSMML) के गेट पर जारी श्रमिकों के धरने में भाटी ने न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, बल्कि अब वहीं अपना 'डेरा' डाल लिया है। दिन में प्रशासन से तीखे सवाल और रात को खुले आसमान के नीचे जमीन पर बिस्तर - आखिर क्यों एक विधायक को इस कदर सड़कों पर उतरना पड़ा?
बाड़मेर के गिरल क्षेत्र में श्रमिक पिछले 25 दिनों से अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे थे। जब स्थानीय प्रशासन और कंपनी ने उनकी अनसुनी की, तो विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने खुद कमान संभाली।
स्थानीय रोजगार का मुद्दा: भाटी का आरोप है कि यहाँ की जमीन, यहाँ का पर्यावरण और यहाँ के संसाधन उपयोग हो रहे हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।
शिक्षा और स्वास्थ्य: प्रोजेक्ट के कारण प्रभावित क्षेत्रों में न तो अच्छे स्कूल हैं और न ही बेहतर चिकित्सा सुविधाएं।
विधायक भाटी ने खुद गिरल क्षेत्र की खदानों का दौरा किया और वहां जो देखा, उसने सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खोल दी।
सुरक्षा में भारी चूक: इतनी बड़ी माइनिंग साइट, जहाँ सैकड़ों श्रमिक काम करते हैं, वहां न तो एक एम्बुलेंस की उचित व्यवस्था है और न ही फायर ब्रिगेड।
अंधेरे में जिंदगी: चौबीसों घंटे खनन कार्य चलने के बावजूद साइट पर पर्याप्त लाइटिंग की व्यवस्था नहीं है, जिससे किसी भी वक्त बड़ा हादसा हो सकता है।
पर्यावरण का दोहन: विकास के नाम पर स्थानीय संसाधनों और पर्यावरण को जो नुकसान पहुँचाया जा रहा है, उसका कोई हिसाब-किताब नहीं है।
धरनास्थल से जारी अपने जोशीले संदेश में रविंद्र सिंह भाटी ने स्पष्ट कर दिया कि वे झुकने वाले नहीं हैं। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, "जिनके आशीर्वाद और स्नेह ने एक सामान्य शिक्षक के बेटे को इस मुकाम तक पहुँचाया है, उनके हक और सम्मान की लड़ाई में मैं सदैव मजबूती से खड़ा रहूंगा। ज़रूरत पड़ी तो सबसे पहले मैं खुद आगे आऊंगा, अपने लोगों के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार हूं।"
रविंद्र सिंह भाटी का धरनास्थल पर ही रात्रि विश्राम करना प्रशासन के लिए सिरदर्द बन गया है। रोजाना हजारों की संख्या में ग्रामीण और समर्थक वहां जुट रहे हैं, जिससे यह आंदोलन अब जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। स्थानीय प्रशासन अब इस उलझन में है कि भाटी को धरना खत्म करने के लिए कैसे मनाया जाए, क्योंकि विधायक ने साफ कर दिया है कि जब तक ठोस कार्रवाई नहीं होती, वे वहां से नहीं हटेंगे।
पचपदरा रिफाइनरी के बाद अब गिरल माइन्स का यह मुद्दा राजस्थान की राजनीति में बड़ा मोड़ ले सकता है। भाटी की जिद और ग्रामीणों का लामबंद होना यह संकेत दे रहा है कि अगर RSMML और सरकार ने मांगों पर तुरंत गौर नहीं किया, तो यह प्रदर्शन बाड़मेर की सीमाओं को लांघकर जयपुर तक पहुँच सकता है। आखिर कंपनी प्रबंधन किस दबाव में सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर रहा है? और क्या प्रशासन के पास भाटी के इन तीखे सवालों का कोई जवाब है?