बाड़मेर

7 साल से वीरान पड़ा राजस्थान का इकलौता अंतरराष्ट्रीय रेलवे स्टेशन, कभी थार एक्सप्रेस से गूंजता था मुनाबाव

Munabao Railway Station: भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित राजस्थान का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय रेलवे स्टेशन मुनाबाव आज अपनी पहचान बचाने की जंग लड़ रहा है। कभी दोनों देशों के लोगों को जोड़ने वाला यह स्टेशन आज सात वर्षों से वीरानी की चादर ओढ़े खड़ा है।
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Updated: 28 Jun 2026, 2:29 PM IST
Munabao railway station
मुनाबाव रेलवे स्टेशन। पत्रिका फाइल फोटो

बाड़मेर। भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित राजस्थान का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय रेलवे स्टेशन मुनाबाव आज अपनी पहचान बचाने की जंग लड़ रहा है। कभी दोनों देशों के लोगों को जोड़ने वाला यह स्टेशन आज सात वर्षों से वीरानी की चादर ओढ़े खड़ा है। वर्ष 2019 में थार एक्सप्रेस का संचालन बंद होने के बाद यहां की चहल-पहल मानो इतिहास बनकर रह गई। करोड़ों रुपए की लागत से विकसित अंतरराष्ट्रीय सुविधाएं अब उपयोग के अभाव में जर्जर होती जा रही हैं।

कभी सप्ताह में एक दिन मुनाबाव रेलवे स्टेशन पर अलग ही नजारा देखने को मिलता था। भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली थार एक्सप्रेस के यात्रियों की आवाजाही से पूरा स्टेशन गुलजार रहता था। सुरक्षा एजेंसियों, रेलवे, कस्टम, इमिग्रेशन, आरपीएफ और जीआरपी सहित करीब 70 से 80 कर्मचारियों की तैनाती रहती थी। प्लेटफॉर्म पर यात्रियों की भीड़, जांच प्रक्रिया और आवागमन से यह स्टेशन सीमावर्ती क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधियों का केंद्र बना रहता था।

सात साल में बदल गई तस्वीर

अगस्त 2019 में भारत-पाकिस्तान के बीच बिगड़े संबंधों के बाद पहले पाकिस्तान ने थार एक्सप्रेस सेवा निलंबित की और बाद में भारत ने भी इसका संचालन अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया। इसके बाद से मुनाबाव स्टेशन की रौनक पूरी तरह खत्म हो गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से लैस यह स्टेशन अब लगभग खाली पड़ा रहता है। वर्तमान में यहां केवल दो ट्रेनें नियमित रूप से आ-जा रही हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्टेशन के अनुरूप सुविधाओं का उपयोग नहीं हो पा रहा है। भीषण गर्मी में यात्रियों को पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं हो रहा। कई स्थानों पर पंखे बंद पड़े हैं। रखरखाव के अभाव में स्टेशन की स्थिति लगातार बिगड़ रही है।

करोड़ों की परिसंपत्तियां बेकार

अंतरराष्ट्रीय स्टेशन के रूप में विकसित करने के लिए यहां करीब 10 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। यात्रियों की सुविधा के लिए विकसित कई संसाधन आज उपयोग के अभाव में धूल फांक रहे हैं। कभी दो देशों के बीच संपर्क का प्रतीक रहा यह स्टेशन अब उपेक्षा का प्रतीक बनता जा रहा है।

चार लाख यात्रियों का रहा गवाह

थार एक्सप्रेस के संचालन के दौरान मुनाबाव रेलवे स्टेशन ने चार लाख से अधिक यात्रियों की आवाजाही देखी। वर्षों तक यह ट्रेन दोनों देशों में बसे परिवारों, रिश्तेदारों और सांस्कृतिक संबंधों की महत्वपूर्ण कड़ी बनी रही। सीमा पर स्थित इस स्टेशन ने अनेक भावनात्मक मिलन और बिछड़ने के दृश्य भी देखे, लेकिन पिछले सात वर्षों से यह सब थम गया है।

पर्यटन की नई पहचान बन सकता है स्टेशन

सीमावर्ती क्षेत्र की ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्ता को देखते हुए मुनाबाव रेलवे स्टेशन को केवल रेलवे परिसंपत्ति तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसे सीमांत विरासत (बॉर्डर हेरिटेज) और पर्यटन गतिविधियों से जोड़कर विकसित किया जा सकता है। भारत के अंतिम रेलवे स्टेशन के रूप में इसकी अलग पहचान बनाई जा सकती है, जिससे सीमावर्ती पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। रेलवे चाहे तो यहां उपलब्ध आधारभूत ढांचे का बेहतर उपयोग करते हुए पर्यटन आधारित प्रस्ताव तैयार कर राज्य और केंद्र सरकार को भेज सकता है। यदि किसी एक नियमित ट्रेन का संचालन इस अंतरराष्ट्रीय स्टेशन तक बढ़ाया जाए तो यहां यात्रियों की संख्या भी बढ़ेगी और स्टेशन की गतिविधियां भी फिर से जीवंत हो सकती हैं।

Updated on:
28 Jun 2026, 2:29 PM IST
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