बाड़मेर

barmer: नयना जांगिड़ ने रेगिस्तान में नवाचार, जैविक खाद और जल संरक्षण से खेती का सफल मॉडल किया तैयार

मुंबई के महानगर से बाड़मेर की बंजर धरा तक का सफर तय करने वाली नयना जांगिड़ ने विपरीत परिस्थितियों को मात देकर खेती-किसानी में एक प्रेरणादायक सफलता हासिल की है। शादी के बाद बाड़मेर आईं नयना ने प्रकृति के प्रति अपने गहरे लगाव और परिवार के सहयोग से जैविक खाद, जल संरक्षण और आधुनिक नवाचारों को अपनाकर रेगिस्तान में उम्मीद की फसलें लहलहा दी हैं।
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Updated: 4 Nov 2026, 7:50 PM IST
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नयना जांगिड़ ने रेगिस्तान में नवाचार

बाड़मेर. रेगिस्तान की तपती रेत, भीषण गर्मी और पानी का संकट। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में एक महिला का खेती-किसानी करना आसान नहीं था। लेकिन नयना जांगिड़ नवाचार, जैविक खाद और जल संरक्षण के मॉडल को अपनाकर खेती में सफलता की नई इबारत लिख रही हैं। मुंबई जैसे महानगर में पली-बढ़ीं नयना जांगिड़ 2003 में जब शादी के बाद बाड़मेर आईं तो जीवन की राह भी बदल गई। शुरुआती वर्षों में गृहिणी के रूप में परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं, लेकिन पेड़-पौधों और प्रकृति के प्रति उनका लगाव हमेशा बना रहा। परिवार का सहयोग मिला तो इस रुचि को खेती में बदलने का फैसला किया।

आज वे करीब 50 बीघा फार्म में खेती का प्रबंधन कर रही हैं। इनमें आधे में अनार की खेती है। उनकी पहचान सिर्फ एक सफल महिला किसान के रूप में नहीं, बल्कि खेती को पर्यावरण संरक्षण और महिला रोजगार से जोडऩे वाली उद्यमी के रूप में भी बन रही है। करीब छह साल पहले अनार की खेती शुरू की थी। खेत में अनार के एक हजार पौधे हैं। इनसे सालाना करीब 12 से 15 टन उत्पादन होता है। वे बाजरा, मूंगफली, जीरा और अन्य फसलें भी उगाती हैं। खेती में वे गांवों की महिलाओं को काम दे रही हैं। महिलाएं ही अनार की खेती से जुड़े काम संभाली हैं। इससे उन महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है।

हिरण-मोर, सांप जंगल में छोड़े:

प्राकृतिक वातावरण में यहां पक्षियों और वन्यजीवों की भी मौजूदगी रहती है। इस वर्ष उनके फार्म पर करीब 10 हिरण, दो मोर और 41 सांप मिले। वन विभाग की मदद से सुरक्षित जंगल क्षेत्र में छोड़ा गया।

खेत में रसायनों की जगह गोबर और केंचुआ खाद

नयना खेती में जैविक तरीकों को प्राथमिकता देती हैं। गौशाला से मिले गोबर का उपयोग खाद के रूप में करती हंै। कृषि विज्ञान केंद्र से केंचुए प्राप्त कर खेत में ही वर्मी कम्पोस्ट तैयार किया जाता है। पेड़-पौधों से गिरने वाली पत्तियों और जैविक कचरे को जलाने के बजाय उन्होंने अलग डीकंपोज एरिया बनाया है। इसमें पत्तियों के साथ गोबर, मिट्टी, गुड़ और पानी डालकर प्राकृतिक तरीके से खाद तैयार की जाती है। इससे खेत की मिट्टी को पोषक तत्व मिलते हैं और कचरा जलाने से होने वाले प्रदूषण से भी बचाव होता है।

नीम के पेड़ सुरक्षा कवच

बाड़मेर की भीषण गर्मी, लू और सर्द हवाओं के बीच खेती करना आसान नहीं है। इसलिए फार्म के चारों ओर करीब 100 नीम के पेड़ लगाए हैं। अब ये पेड़ घने हो चुके हैं और खेत के चारों ओर प्राकृतिक हरित घेरा तैयार हो गया है। इससे तेज गर्मी के दौरान खेत के आसपास तापमान कम रखने में मदद मिलती है। नीम की पत्तियां भी खाद के रूप में उपयोगी साबित होती हैं। इसके अलावा फार्म में चीकू, आंवला, गोंदा, बेर, बोडी, सांगरी, कुम्हट और जामुन सहित कई देशी प्रजातियों के पेड़-पौधे लगाए हैं।

बारिश की हर बूंद जमीन में उतारने की व्यवस्था

मरुस्थलीय बाड़मेर में पानी की अहमियत को समझते हुए नयना ने फार्म की जमीन की ढलान इस तरह रखी है कि बारिश का पानी बेकार बहकर बाहर निकलने के बजाय जमीन में समा सके। वाटर हार्वेङ्क्षस्टग से भूजल स्तर और ट््यूबवेल के रिचार्ज में मदद मिलती है। वे आसपास के लोगों को भी वर्षा जल संरक्षण और पानी को जमीन में उतारने के उपायों के बारे में जागरूक करती हैं।

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4 Nov 2026, 7:50 PM IST
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