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Exclusive: रेगिस्तान की ढाणियों में धड़कती लोक संस्कृति, शहरों के फाइव स्टार होटलों में बिकती ‘तान’

राजस्थान के 18,653 पंजीकृत लोक कलाकारों में से 79.75% यानी 14,875 ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। जोधपुर, बाड़मेर और जैसलमेर लोक संस्कृति के सबसे बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं।
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बाड़मेर

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Arvind Rao

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योगेंद्र सेन

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Updated: 2 Nov 2026, 12:29 PM IST

rajasthan folk artists

बाड़मेर की कलाकार कॉलोनी में गायकी का रियाज करती अगली पीढ़ी (फोटो: ओम माली)

-योगेंद्र सेन

बाड़मेर: राजस्थान की जिस सतरंगी लोक संस्कृति, रंग-बिरंगी पोशाकों, मांगणियार-लंगा की सुरीली तानों और थिरकते कदमों को देश-दुनिया के सामने पेश कर पर्यटन उद्योग हर साल करोड़ों-अरबों रुपये का कारोबार खड़ा करता है, उस विरासत का असली घर बड़े शहर नहीं, बल्कि थार मरुस्थल के सुदूर गांव और ढाणियां हैं। सरकार के जन सूचना पोर्टल पर पंजीकृत लोक कलाकारों के आंकड़ों की पड़ताल में कला और कलाकारों की एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली तस्वीर उभरकर सामने आई है।

राजस्थान में पंजीकृत कुल 18,653 लोक कलाकारों में से 79.75% (14,875 कलाकार) ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं, जबकि शहरों में महज 3,778 कलाकार ही पंजीकृत हैं। आंकड़े तस्दीक करते हैं कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को जिंदा रखने वाली मुख्य सांसें मरुस्थल के गांवों में चल रही हैं। थार रेगिस्तान के गांवों और ढाणियों में मांगणियार, लंगा, ढोलक, भजन, लोकगायन, कठपुतली, कमायचा, अलगोजा, ढोल और नृत्य आदि विधाओं के कलाकार हैं, जो अपनी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

थार के रेगिस्तान का दबदबा

ग्रामीण लोक कलाकारों की संख्या के मामले में थार का प्रवेश द्वार जोधपुर 1,321 कलाकारों के साथ पूरे प्रदेश में शीर्ष पर है। इसके ठीक बाद बाड़मेर में 1,110 और जैसलमेर में 1,063 कलाकार हैं। यानी अकेले इन तीन मरुस्थलीय जिलों में ही 3,494 ग्रामीण कलाकार अपनी सदियों पुरानी परंपरा को सींच रहे हैं। दूसरी ओर, राज्य की सांस्कृतिक और पर्यटन राजधानी कहे जाने वाले बड़े शहर इस मामले में काफी पीछे हैं। जयपुर में गांवों में 449 तो शहर में 453 कलाकार हैं। उदयपुर में गांवों में 314 और शहर में मात्र 64 कलाकार हैं। अजमेर में गांवों में 331 और शहर में 149 कलाकार हैं। बीकानेर में गांवों में 341, जबकि शहर में 214 कलाकार दर्ज हैं।

प्रमुख जिलों में ग्रामीण बनाम शहरी कलाकारों की स्थिति

जिलाग्रामीण कलाकारशहरी कलाकारकुल कलाकार
जोधपुर1,3212801,601
बाड़मेर1,110911,201
जैसलमेर1,063411,104
पाली9952061,201
बांसवाड़ा8067813
नागौर758123881
अलवर744195939
जयपुर449453902
उदयपुर31464378

इसलिए गांवों-ढाणियों में ही बची है असली लोक संस्कृति

  1. जजमानी और वंशानुगत परंपरा

मरुस्थल में मांगणियार, लंगा, ढोली, भाट और दमामी जैसी जातियों की पारंपरिक जजमानी व्यवस्था आज भी गांवों में जीवित है। शादी-ब्याह, जन्म और मांगलिक अवसरों पर ये कलाकार जजमानों के घर जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, जो शहरों में लगभग समाप्त हो चुकी है।

  1. साधन और साज की मौलिकता

कमायचा, रावणहत्था, अलगोजा, मोरचंग जैसे दुर्लभ लोक वाद्यों को बनाने, साधने और रियाज करने का माहौल गांवों की खुली ढाणियों में ही संभव है। शहर की तंग गलियों और भागदौड़ भरी जिंदगी में इस अनवरत रियाज की गुंजाइश कम हो जाती है।

  1. कठिन जीवन और अभिव्यक्ति का माध्यम

थार का जीवन हमेशा से जल संकट और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से जूझता रहा है। मरुस्थल के निवासियों ने अपनी पीड़ा, विरह, उल्लास और मौसम के मिजाज (कुर्जा, मोरिया, घूमर, फाग) को लोकगीतों और भजनों में ढाला है। लोककला उनके लिए व्यवसाय से पहले जीवन जीने का तरीका है।

  1. व्यावसायीकरण से दूरी

बड़े शहरों में लोककला का बाजारीकरण हो चुका है, जहां कलाकार होटलों और रिसॉर्ट्स के मुताबिक अपनी कला को ढालते हैं। इसके विपरीत, गांव-ढाणियों में आज भी बिना किसी बनावट के मौलिक और विशुद्ध लोक संगीत की तानें गूंजती हैं।

पश्चिमी राजस्थान में लोक कलाकारों की संख्या अधिक है, क्योंकि रेगिस्तान के कण-कण में कला बिखरी पड़ी है। मांगणियार और लंगा बंधु पीढ़ियों से लोक गायन की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। अलगोजा, मोरचंग, कमायचा और रावणहत्था जैसे वाद्ययंत्र बजाने वाले कलाकार और भजन गायन की ग्रामीण परंपरा आज भी मौजूद है। यहां समाज और कला, दोनों का गहरा जुड़ाव है। सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आयोजनों के साथ ही पारिवारिक आयोजनों में कलाकारों को प्रमुखता से बुलाया जाता है।

-पद्मश्री अनवर खां, उपाध्यक्ष, केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी

हमारे गांव-ढाणियों में पीढ़ियों से कलाकार अपनी विरासत को संजोते आए हैं। यह कला एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को सौंपती आ रही है। यह हमारी संस्कृति और जीवन का हिस्सा है। सामाजिक तानाबाना ही ऐसा है कि आज भी यहां पारिवारिक समारोहों और आयोजनों में लोक कलाकारों को बुलाया जाता है। पर्यटन बढ़ने के साथ कलाकारों का महत्व भी बढ़ा है।

-पद्मश्री तगाराम भील, अलगोजा वादक, जैसलमेर

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