- इस पूरे प्रोजेक्ट में अनियमितताएं होने के कारण आरटीआइ भी फाइल की गई है।
भोपाल : मध्य प्रदेश सरकार के ड्रीम नवीकरण प्रोजेक्ट 115 MW गाँधी सागर हाइड्रो प्रोजेक्ट पर संशय के बादल छा गए है। अधिक ऊर्जा उत्पादन करना सरकार का मुख्य मकसद है, ऐसे में मानकों पर खरा उतरना वाली कंपनी का चयन करना प्रोजेक्ट के लिए एक बड़ी चुनौती बन रहा है. मध्य प्रदेश का 115 MW गांधी सागर हाइड्रो प्रोजेक्ट जो भारत के सबसे बड़े बांधों में से एक बांध पर बना है। इस परियोजना के नवीकरण और आधुनिकरण टेंडर की निर्धारित योग्यता को नम्र करके कुछ अधिकारी बिना योग्यता वाली कंपनी को लाने के लिए नियम और शर्तें बदलाब करने की कोशिश में है। इस पूरे प्रोजेक्ट में अनियमितताएं होने के कारण एक व्यक्ति ने इसे लेकर आरटीआइ भी फाइल की है।
बिना योग्यता वाली कंपनी को टेंडर मिला तो होगा ये नुक्सान
गांधी सागर क़रीबन 60 साल पुराना प्रोजेक्ट है । इस प्रोजेक्ट में 5 मशीन 23 MW की हैं, यानी पूरा प्रोजेक्ट 115 MW का है। 2019 में बाढ़ आ जाने के बाद केवल दो ही यूनिट अस्थायी रूप से चल पा रहे हैं। अब प्रसाधन ने उसके पूरा नवीकरण और आधुनिकरण के विचार से मई महीने में उसका टेंडर निकाला था, जिसका टेंडर जमा करने की तारीख़ इस सितंबर में रखी गई है। परियोजना को पूरा करने की अवधि 60 महीने रखी गयी है। इस प्रोजेक्ट की अनुमति बोर्ड से भी ली गई है, जिसमें मध्य प्रदेश शासन और विद्युत मण्डल क्षेत्र के बड़े बड़े महारथी भी मौजूद होते हैं। लेकिन कुछ अधिकारी कुछ कम्पनियों को लाभ देने के लिए इस टेंडर के नियमों में बदलाव कर रहे है, जिसकी वजह से टेंडर भरने की तारीख़ भी आगे बढ़ा दी गई है। बदलाव में टेंडर की तकनीकी अनुभव और वित्तीय स्थिति योग्यताओं को नम्र किया जा रहा है, जिससे प्रोजेक्ट की सफलता को भारी ख़तरा हो सकता है।इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए बड़ी वित्तीय संस्थाओं से पैसा लोन पर भी लिया जाएगा। काम सही तरीक़े से न होने की वजह से ब्याज तो बढ़ेगा। साथ ही कम ऊर्जा उत्पादन और वित्तीय नुक़सान होगा। प्रशासन अपनी मनमानी करके मध्य प्रदेश की जनता के धन की बर्बादी करने की योजना बना रहा है। अगर उसे अभी रोका ना गया तो सरकार और जनता की मेहनत से कमाए हुए धन का भारी नुक़सान होगा।