प्रतिदिन 71 रुपए मिल रहा मानदेय: मनरेगा से भी कम मिल रही मजदूरी
मिड डे मील के तहत खाना पकाने वाली महिला कुक कम हेल्पर के रोटियां बेलते बेलते हाथ थक जाते है, फिर भी इनको समय पर खाना उपलब्ध करवाना होता है। इतना सब करने के बाद भी इन्हें महज 71 रुपए प्रतिदिन अनुदान मिलता है। जिससे इनका खुद का गुजारा भी नहीं चल सकता है। इनमें से कई महिला कुक कम हेल्पर तो ऐसी है जिनका पूरा समय ही स्कूल में खप जाता है और वे दूसरा कार्य नहीं कर पाती है। इतने कम मानदेय पर काम करने के बाद भी जिले के कुक कम हेल्पर पिछले 6 माह से मानदेय का भुगतान नहीं हो रहा है। कई जिलों में तो 11 माह से मानदेय का भुगतान बकाया चल रहा है। स्कूलों में कक्षा 8 तक के बालकों को मिड डे मील के तहत मेन्यू चार्ट के अनुसार दाल, सब्जी, रोटी व चावल पकाया जाता है। इसे पकाने के लिए सरकारी स्कूलों में छात्र छात्राओं की संख्या के अनुपात के अनुसार महिला कुक कम हेल्पर रखे हुए है। इनको प्रतिमाह 2143 रुपए मानदेय का भुगतान किया जाता है। मार्च तक इनका मानदेय 2 हजार था। अप्रेल में बढ़ाकर 2143 रुपए किया था। पोषाहार पकाने वाली महिलाओं का दर्द ही ऐसा है कि इनको कम मानदेय मिलने व 6 माह से मानदेय का भुगतान होने से परिवार को पालना मुश्किल हो रहा है।
नहीं मिलती छुट्टी
सर्दी गर्मी या फिर बारिश हो। इनको स्कूल खुलने पर हर हालत में स्कूल आना पड़ता है। इनके समक्ष कैसे भी स्थिति हो इनको खाना पकाने के लिए आना ही पड़ता है। पूरे साल में इनको किसी तरह की कोई छुट्टी नहीं मिलती है। कभी किसी जरूरी कार्यवश अनुपस्थित रहने पर मानदेय में कटौती की जाती है। गर्मियों की छुट्टियों में डेढ़ माह के पैसे भी मानदेय में कटौती करके भुगतान किया जाता है।
मनरेगा से कम मजदूरी
मनरेगा में कार्य करने वाले श्रमिकों को प्रतिदिन 266 रुपए मजदूरी का भुगतान किया जाता है। जबकि कुक कम हैल्पर को मात्र 71 रुपए का भुगतान किया जाता है। ऐसे में इनके परिवार का पालन पोषण नहीं हो पा रहा है। कुक कम हेल्पर लम्बे समय से मानदेय में बढ़ोतरी की मांग कर रही है। कोई सुनवाई नहीं हो रही है। विद्यालय में जब भी कोई जनप्रतिनिधि या अधिकारी आते है हेल्पर उन्हें अपनी पीड़ा बताते है, आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। 50 छात्र छात्राओं के अनुपात पर एक हेल्पर रखने का प्रावधान है।
इस काम में सारा दिन खप जाता है
कुक कम हैल्पर को सुबह स्कूल खुलने के समय 9.30 बजे स्कूल पहुंचना पड़ता है। मध्यांतर तक खाना पकाकर इसे बालकों को परोसना पड़ता है। अब सभी स्कूलों में रसोई गैस कनेक्शन उपलब्ध होने के बाद स्कूलों में रोटियों को सेकने का कार्य अब गैस के चूल्हों पर हो रहा है। खाना परोसने के बाद बर्तन साफ करना व रसोई का काम निपटा कर घर पहुंचने तक शाम हो जाती है।
आंकड़ों पर एक नजर
जिले में कुक कम हैल्पर 1477
पोषाहार बनने वाली स्कूलें 971
प्रतिमाह मानदेय 2143
समय पर नहीं मिलता मानदेय
कुम कम हैल्परों को जो मानदेय मिलता है वह भी समय पर नहीं मिलता है। कई बार तो 7 माह का मानदेय एक साथ मिलता है। मानदेय के साथ राशन सामग्री का बजट भी पिछले 6 माह से नहीं आ रहा है। बजट के समय से उपलब्ध नहीं होने से मिड डे मील प्रभारी को दुकानदारों से उधार में राशन सामग्री खरीदनी पड़ती है। बजट नहीं आने से कई प्रभारी जेब से भी भुगतान करके मिड डे मील सामग्री खरीद रहे है।
इनका कहना है
जिले में महिला कुक कम हेल्पर के मानेदय सहित राशन सामग्री का बजट भी अप्रेल बाद से अटका हुआ है। मिड डे मील की सभी स्कूलों की प्रतिदिन की रिपोर्ट अपडेट की जा रही है। बजट आवंटन होने पर मानदेय का भुगतान कर दिया जाएगा।
रामसिंह यादव, जिला शिक्षा अधिकारी कोटपूतली बहरोड़