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राजस्थान में 50 गांवों में पानी की मिठास खारेपन में बदली, फ्लोराइड से आमजन की बिगड़ रही सेहत

जयपुर जिले के चौमूं उपखंड के करीब 50 से अधिक गांव कभी मीठे पानी के लिए पहचाने जाते थे, लेकिन अब खारे पानी की मार झेल रहे हैं। गिरते भूजल स्तर और बढ़ते फ्लोराइड ने न केवल पेयजल संकट गहरा दिया है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। अब […]

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बस्सी

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Vinod Sharma

Mar 30, 2026

Rajasthan Water Crisis, Fluoride Contamination

मलिकपुर में पानी का टीडीएस जांचते हुए।

जयपुर जिले के चौमूं उपखंड के करीब 50 से अधिक गांव कभी मीठे पानी के लिए पहचाने जाते थे, लेकिन अब खारे पानी की मार झेल रहे हैं। गिरते भूजल स्तर और बढ़ते फ्लोराइड ने न केवल पेयजल संकट गहरा दिया है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। अब कई गांवों में पानी बीमारी का कारण बनता जा रहा है। लोगों में जोड़ों का दर्द, हड्डियों की कमजोरी और दांतों की समस्याएं बढ़ रही हैं। उपखंड क्षेत्र के गांवों और ढाणियों में भूजल स्तर 900 से 1200 फीट तक पहुंच गया और फ्लोराइड का स्तर भी 1500 से 2500 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच चुका है। यह क्षेत्र आज गिरते भूजल स्तर, बढ़ती लवणता और फ्लोराइड की मार से जूझ रहा है।

पीने योग्य नहीं पानी, आरओ भी बेअसर…
गोविंदगढ़, मलिकपुर, सीतारामपुरा, चारणवास, किशन मानपुरा, आष्टी, हस्तेड़ा, बागड़ों का बास, आलिसर, सांदरसर, सिंगोद, कालाडेरा, जालिम सिंह का बास, खन्नीपुरा, खेजरोली, लोहरवाड़ा और उदयपुरिया सहित करीब 50 गांवों में पानी में फ्लोराइड और लवणता इतनी बढ़ गई है कि यह पीने योग्य नहीं रहा। लोगों ने घरों में आरओ प्लांट लगाकर समाधान तलाशने की कोशिश की, लेकिन अधिक लवणता के कारण यह तकनीक भी सीमित साबित हो रही है। इससे गरीब और ग्रामीण परिवारों के सामने शुद्ध पानी की उपलब्धता बड़ी चुनौती बन गई है।

ढाणियों में आज भी कुओं का सहारा…
गांवों और कस्बों में जहां सार्वजनिक जलापूर्ति से कुछ हद तक राहत मिलती है, वहीं ढाणियों में आज भी लोग पेयजल के लिए कृषि कुओं और बोरिंग पर निर्भर हैं। अधिकतर स्थानों पर पानी की नियमित जांच नहीं होने से लोग अनजाने में ही दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सुरक्षित पेयजल में टीडीएस 300 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होना चाहिए, जबकि 300 से 600 मिलीग्राम तक का स्तर स्वीकार्य माना जाता है। इसके विपरीत क्षेत्र में कई जगहों पर टीडीएस 1500 से 2500 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच चुका है, जिससे पानी का स्वाद खारा और कसैला हो गया है।

स्वास्थ्य पर गहरा असर…
चिकित्सकों के अनुसार फ्लोराइड युक्त पानी शरीर में धीरे-धीरे जमा होकर हड्डियों को कमजोर करता है और अस्थि फ्लोरोसिस जैसी बीमारी को जन्म देता है। बच्चों में यह समस्या अधिक गंभीर हो सकती है, क्योंकि उनकी हडि्डयां विकासशील अवस्था में होती हैं। गर्भवती महिलाएं यदि लंबे समय तक ऐसा पानी पीती हैं, तो इसका असर गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ सकता है। क्षेत्र में अब कम उम्र में ही लोगों में कमर झुकना, शारीरिक कमजोरी, हाथ-पैरों में विकृति, दांतों का पीला पड़ना और मसूड़ों की समस्याएं सामने आने लगी हैं। इसके साथ ही पथरी के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

अस्पतालों में बढ़े मरीज…
गोविंदगढ़ सीएचसी के आंकड़ों के अनुसार करीब 5 वर्ष पहले फ्लोराइड से जुड़ी बीमारियों के मरीज करीब 5 प्रतिशत थे, जो अब बढ़कर 10 से 15 प्रतिशत तक पहुंच गए हैं। यही स्थिति चौमूं उपजिला अस्पताल और अन्य चिकित्सा संस्थानों में भी देखने को मिल रही है।

इनका कहना है…
अधिक फ्लोराइड युक्त पानी का सेवन करने से गर्दन, पीठ, कंधे और घुटनों के जोड़ों व हडि्डयों पर असर पड़ता है। इसके अलावा स्मरण शक्ति में कमी, गुर्दे की बीमारी और बांझपन जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।
-डॉ.दशरथ मीणा, सीएचसी प्रभारी, गोविंदगढ़