
बैतूल। कोरोना वायरस की दहशत के चलते इस साल होली का रंग फीका पड़ता नजर आ रहा है। बाजार रंग-गुलाल और पिचकारियों सज गया है लेकिन कोई खरीदारी करने नहीं पहुंच रहा है। होली पर रंग-गुलाल का कारोबार भी ५० प्रतिशत से कम हो गया है। आवासीय विद्यालय भारतभारती में तो छात्रों द्वारा कैमिकल रंगों की जगह पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार किया जा रहा है। कुछ जगहों पर कड़े से होली तैयार की गई है ताकि पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सके। इधर कोरोना वायरस के तेजी से फैलने और इनके मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जिला अस्पताल प्रशासन ने अस्पताल में प्रवेश करने वाले सभी आगंतुक के सेनेटाइजर से हैंडवॉश करवाए जा रहे है। साथ ही कर्मचारियों को मास्क पहनकर ही मरीजो को देखने की हिदायत दी है।
सेनेटाइजर से करवा रहे आगंतुकों का हैंडवॉश
कोरोना वायरस की दहशत को देखते हुए हर कोई अपने स्तर पर इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए उपाय कर रहा है। इसी कड़ी में बैतूल जिला अस्पताल ने भी वायरस की रोकथाम के लिए अस्पताल में प्रवेश करने वाले सभी आगंतुक के सेनेटाइजर से हैंडवाश करवाए जा रहे है। वहीं अस्पताल प्रशासन ने अपने कर्मचारियों को मास्क पहनकर ही मरीजो को देखने की हिदायत दे रखी है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जीसी चौरसिया ने बताया कि आगामी पर्व होली मनाने में बरती जाने वाली किसी भी प्रकार की असावधानी आंखों के लिए खतरा साबित हो सकती है। उन्होंने केमिकल युक्त रंगों का इस्तेमाल न करने एवं कोरोना वायरस से बचाव के लिए सूखी होली खेलने की आमजन से अपील की है।
पलाश फूलों से तैयार किया जा रहा प्राकृतिक रंग
देश भर में कोरोना वायरस की बढ़ती दहशत के बीच स्वास्थ्य विभाग होली पर कैमिकल रंगों के उपयोग नहीं करने की हिदायत दे रहा है। जिसे देखते हुए आवासीय विद्यालय भारतभारती के सचिव मोहन नागर द्वारा छात्रों के साथ मिलकर पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार किया जा रहा है। सचिव नागर ने बताया कि हर साल उनके द्वारा प्राकृतिक रंग से ही होली का पर्व मनाया जाता है। चूंकि इस साल देश भर में कोरोना वायरस का कहर मचा हुआ है इसलिए होली खेलने में भी सावधानी बरती जा रही है। कैमिकल रंगों का पूर्णत: प्रतिबंध कर दिया गया है।
लकडिय़ों की जगह कंडे की होली तैयार
होलिका दहन में हर साल हजारों क्ंिटल लकडिय़ों का प्रयोग होता है लेकिन इस बार पर्यावरण संरक्षण को देखते हुए बहुत से स्थानों पर कंड़ों की होलिका तैयार की जा रही है ताकि इससे निकलने वाले धुएं से बैक्टीया का खात्मा हो सके और पर्यावरण का संरक्षण हो। कंडे से बनी होली में कपूर का इस्तेमाल भी किया जाता है ताकि कपूर के धुएं से पर्यावरण शुद्ध हो सके। यहीं कारण है होली बनाने में इस बार लकड़ी का इस्तेमाल कर और कड़ों का इस्तेमाल ज्यादा किया जा रहा है। इसकी बड़ी वजह कोरोना वायरस का देश में अटैक भी माना जा रहा है।
कैमिकल रंगों से बनाई दूरी, सिर्फ गुलाल की खरीदी
होली का मजा रंगों से ही होता है लेकिन इस साल कोरोना वायरस की दहशत से होली का रंग फीका पड़ गया है। होली पर कैमिकल रंगों की जगह गुलाल की खरीदी भर की जा रही है। हालांकि इस वायरस को लेकर लोगों में दहशत इतनी ज्याद है कि वे गुलाल भी होली की औपचारिकता के लिए खरीद रहे हैं। वैसे युवाओं का कहना है कि वे तो रंग गुलाल जमकर खेलेंगे, लेकिन रंग-गुलाल का जो कारोबार है वह खरीदी नहीं होने से ५० प्रतिशत से भी कम हो गया है। बच्चे जो सबसे ज्यादा इस पर्व को आनंद लेते हैं वे भी इस बार होली से दूरी बनाए हुए हैं।