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Explainer: US Midterm Elections Results में ट्रम्प की हार से भारत में सस्ते होंगे पेट्रोल-डीजल, रूस से तेल आयात पर क्या होगा असर?

Impact of US Midterm Elections Results On India: अमेरिका में हुए मिडटर्म चुनावों के परिणामों में जिस तरह प्रेजिडेंट ट्रंप कमजोर पड़े हैं, उससे भारत पर क्या असर पड़ सकता है, समझिए...
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Updated: 6 Nov 2026, 4:22 PM IST
Global Crude Oil Prices 2026
डोनाल्ड ट्रम्प और पीएम मोदी (फोटो एआई)

US Midterm Elections Impact India Oil: अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में डोनाल्ड ट्रम्प की हार और डेमोक्रेटिक पार्टी की शानदार जीत भारत के लिए खट्टा-मीठा अनुभव हो सकती है। इस जीत के साथ डेमोक्रेटिक का कांग्रेस यानी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर नियंत्रण हो गया है। इससे उम्मीद जगी है कि ईरान विवाद हल हो सकता है और होर्मुज स्ट्रैट से एनर्जी सप्लाई पूरी तरह बहाल हो सकती है। यदि ऐसा होता है, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट संभव है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर है, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट उसके लिए बड़ी आर्थिक राहत होगी। इससे देश का बढ़ता हुआ तेल आयात बिल कम होगा, महंगाई का दबाव घटेगा और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की वित्तीय स्थिति में सुधार होगा। इस लिहाज से देखें, तो अमेरिका के मिड टर्म चुनाव के नतीजे भारत के लिए अच्छे हो सकते हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है, जो चिंताजनक है।

बनी रहेगी ये आशंका, बिगड़ भी सकते हैं हालात

डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस, डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन के लिए रूस पर लगे प्रतिबंधों में ढील देना राजनीतिक रूप से कठिन बना सकती है। साथ ही, यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को पर अधिक दबाव डालने या उसे भारी कीमत चुकाने के लिए मजबूर करने जैसे मांगें भी उठ सकती हैं। ऐसी कोई भी स्थिति रूस से भारत के तेल आयात को मुश्किल में डाल सकती है, जो भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत है। चुनाव के नतीजे आने के साथ ही, बुधवार को ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 8.7% गिरकर 94.62 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। जबकि गुरुवार दोपहर तक, तेल की कीमतें बुधवार के स्तर के आसपास ही बनी रहीं। हालांकि, आज यानी शुक्रवार को यह चढ़कर 99.70 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है। वैसे, मिड टर्म चुनाव में हार का मतलब ये नहीं है कि बतौर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अधिकार खत्म हो गए हैं। उनके पास विदेश नीति को लेकर अब भी काफी अधिकार हैं। ऐसे में यह आशंका भी बनी रहेगी कि चुनाव में मिली हार के बाद, वे पश्चिम एशिया के संघर्ष में और भी आक्रामक रुख अपना सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो हालात सुधारने के बजाए बिगड़ सकते हैं।

अब क्या हो सकता है आगे? एक्सपर्ट्स से जानें...

एक्सपर्ट्स का मानना है कि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के खराब प्रदर्शन के कारण, वाशिंगटन पर ईरान संघर्ष को बातचीत के जरिए खत्म करने का दबाव बढ़ेगा। रिपब्लिकन खेमे के भीतर भी ईरान युद्ध को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सार्वजनिक रूप से ट्रम्प प्रशासन की विदेश नीति से असहमति जताई है और चुनावों में मिली हार के लिए इसी युद्ध को जिम्मेदार ठहराया है। एनर्जी रिसर्च कंपनी Rystad Energy ने चुनावी नतीजों के बाद कहा, ‘सैन्य हमलों, नाकेबंदी और प्रतिबंधों से जुड़ी छूट देने के मामलों में राष्ट्रपति के पास पूरा विवेकाधीन अधिकार होता है। आज तक कोई भी 'वॉर पावर्स रेजोल्यूशन' (युद्ध शक्तियों से जुड़ा प्रस्ताव) राष्ट्रपति के वीटो को पार नहीं कर पाया है और कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के पास इतनी सीटें भी नहीं हैं कि वे राष्ट्रपति के वीटो को पलट सकें। हालांकि, एक एकजुट डेमोक्रेटिक कांग्रेस यह जरूर कर सकती है कि वह संघर्ष बढ़ाने को काफी महंगा बना दे। उदाहरण के तौर पर दोनों सदन प्रस्ताव पारित कर सकते हैं, युद्ध पर होने वाले खर्च के साथ शर्तें जोड़ सकते हैं, और अहम पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति को रोक सकते हैं’।

वहीं, अबू धाबी की एनर्जी एनालिस्ट नतालिया काटोना (Natalia Katona) ने चेतावनी दी है कि भले ही पश्चिम एशिया में संघर्ष खत्म होने और ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने को लेकर उम्मीदें बढ़ रही हैं, लेकिन बहुत ज़्यादा आशावादी होना जोखिम भरा हो सकता है। उन्होंने कहा कि ट्रम्प ने युद्ध जारी रखने के अपने फैसले का बचाव किया है। मतदान के अगले दिन, 4 नवंबर को, वाशिंगटन ने एक ऐसे नेटवर्क पर प्रतिबंध लगा दिया जो ईरानी तेल ले जाने वाले टैंकरों की फर्जी झंडे लगाने में मदद करता था, ताकी असली पहचान छिपाई जा सके। डेमोक्रेट्स के चयनित सदस्य 3 जनवरी को पदभार ग्रहण करेंगे। संभव है कि तब वे सैन्य फंडिंग हासिल करना मुश्किल बना दें, लेकिन तब तक, ट्रम्प के पास दबाव बढ़ाने का मौका है। 

ईरान युद्ध से ऐसे प्रभावित हुआ भारत

ईरान संघर्ष के चलते भारत को बड़ा झटका लगा है। भारत की एनर्जी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज के रास्ते आता है और इस समुद्री मार्ग के अवरुद्ध होने से उसे ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा है। देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुकी हैं। युद्ध से पहले, भारत का लगभग 40% तेल आयात, 60% LNG आयात और 90% LPG आयात नियमित रूप से पश्चिम एशिया से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता था। देश की आयात पर निर्भरता तेल के मामले में 88% से अधिक, LPG के मामले में 60% और प्राकृतिक गैस के मामले में लगभग 50% है।

हालांकि हाल के वर्षों में भारतीय रिफाइनरियों ने नए विकल्प तलाशे हैं और रूस सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में सामने आया है। इसके बावजूद देश के लिए खाड़ी देशों से आने वाला कच्चा तेल महत्वपूर्ण है। युद्ध के शुरुआती महीनों में पश्चिमी एशियाई कच्चे तेल की उपलब्धता बहुत कम हो गई थी, लेकिन हाल के महीनों में इसमें काफी सुधार हुआ है। मगर समस्या ये है कि अब इस क्षेत्र से गुजरने वाले तेल पर अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान करना पड़ता है- युद्ध जोखिम प्रीमियम। इसके चलते यह कच्चा तेल अभी भी काफी महंगा पड़ रहा है। नतालिया काटोना का कहना है कि भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा तब होगा जब खाड़ी देशों में तनाव कम हो। इससे तेल की आपूर्ति अधिक भरोसेमंद हो जाएगी और टैंकरों का भाड़ा भी कम हो जाएगा। जब तक टैंकरों की आवाजाही सामान्य नहीं हो जाती और आपूर्ति में और रुकावट आने का खतरा टल नहीं जाता, तब तक भारत को अनिश्चितता और तेल व गैस की ऊंची कीमतों का सामना करना पड़ेगा। 

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में भारत का तेल आयात बिल पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 46.4% बढ़कर 90.6 अरब डॉलर हो गया है। गौरतलब है कि पिछले पूरे वित्त वर्ष में कुल तेल आयात लगभग 135 अरब डॉलर का था। अप्रैल-सितंबर के दौरान LNG का आयात भी पिछले साल के मुकाबले 23.2% बढ़कर 8.5 अरब डॉलर हो गया है।

भारत हर साल 1.8 से 2 अरब बैरल तेल आयात करता है। तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की बढ़ोतरी होने पर, देश का सालाना तेल आयात बिल 2 अरब डॉलर तक बढ़ जाता है। नोमुरा की मार्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेल की ऊंची कीमतों से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली तीन एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में भारत भी शामिल है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तेल की कीमतों में हर 10% की बढ़ोतरी से आमतौर पर देश का चालू खाता घाटा GDP के 0.4% तक बढ़ जाता है। देश के कुल वस्तु आयात में कच्चे तेल का हिस्सा सबसे ज्यादा है।

तेल आपूर्ति में भी रूस बना भारत का अहम सहयोगी

वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में कमी आने से भारत को फायदा जरूर होगा, लेकिन रूस के खिलाफ अमेरिका द्वारा कड़े प्रतिबंध लगाने की आशंका नई दिल्ली के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म केप्लर (Kpler) के टैंकर डेटा के अनुसार, सितंबर में भारत ने रूस से प्रतिदिन 1.9 मिलियन बैरल (bpd) कच्चा तेल आयात किया। यह उस महीने भारत के कुल तेल आयात का 35% से अधिक था। दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान पश्चिमी एशियाई देशों से होने वाले तेल आयात में भी काफी सुधार देखने को मिला। इससे पहले के महीनों में रूस से आयात की मात्रा और भी अधिक थी। जुलाई में यह 2.8 मिलियन के अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस से भारत का तेल आयात तेजी से बढ़ा है। फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला किए जाने के बाद, पश्चिमी देशों ने रूसी कच्चे तेल से दूरी बना ली। इसके बाद, रूस ने तेल खरीदने के इच्छुक देशों को छूट देना शुरू कर दिया। भारतीय रिफाइनरियों ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाया। नतीजतन, रूस जो पहले भारत को बहुत कम तेल आपूर्ति करता था, अब कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है और इसने पारंपरिक पश्चिमी एशियाई आपूर्तिकर्ताओं की जगह ले ली है।

क्या ट्रम्प के नरम रुख में आएगा बदलाव?

वैसे, ट्रम्प प्रशासन ने रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने के लिए अक्सर भारत को निशाना बनाया था, मगर हाल के महीनों में मॉस्को और रूस के ऊर्जा निर्यात को लेकर वाशिंगटन का रुख काफी नरम हो गया है। कुछ हफ्ते पहले ही, ट्रम्प ने रूसी डीजल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी और कहा कि अमेरिका भी मॉस्को से डीजल खरीदेगा। इसके अलावा उन्होंने 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शिनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' की कुछ अहम धाराओं को लागू करने से भी छूट दे दी। इन धाराओं में रूस से एनर्जी खरीदने वाले प्रमुख देशों, जैसे भारत और चीन पर 100% तक शुल्क (टैरिफ) लगाने का प्रावधान था। लेकिन डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस, रूसी तेल से होने वाली कमाई को सीमित करने के लिए मॉस्को के प्रति सख्त रुख अपनाने का दबाव डाल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि डेमोक्रेट्स, ट्रम्प प्रशासन पर दबाव डालेंगे कि वह प्रतिबंधों में दी गई मौजूदा छूट पर पुनर्विचार करे। साथ ही वे रूसी ऊर्जा कंपनियों, बैंकों और शिपिंग नेटवर्क पर और भी कड़े प्रतिबंध लगाने की मांग कर सकते हैं। अगर प्रतिबंध सख्त होते हैं, तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल के भुगतान की व्यवस्था करना, टैंकरों का इंतजाम करना या कार्गो के लिए बीमा हासिल करना मुश्किल और महंगा हो सकता है।

एनर्जी एनालिस्ट नतालिया काटोना के अनुसार, डेमोक्रेट्स रूसी तेल के भुगतान की व्यवस्था को सख्त बना सकते हैं। इससे रूसी तेल तो सस्ते दाम पर मिलता रहेगा, लेकिन भुगतान की व्यवस्था करना मुश्किल हो जाएगा। ब्लैक सी (Black Sea) के रास्ते माल ढुलाई पहले से ही महंगी और जोखिम भरी है। इसलिए, लोडिंग पोर्ट पर सस्ता दिखने वाला रूसी तेल, भारतीय रिफाइनरियों तक पहुंचते-पहुंचते शायद ही कोई खास बचत करा पाए।

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6 Nov 2026, 4:22 PM IST
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