
भरतपुर जिले की बयाना विधानसभा सीट से पूर्व विधायक रहे अतर सिंह भड़ाना का क्रेशर प्लांट पर हुए हिंसक हमले के बाद आकस्मिक निधन हो गया। इस घटना ने पूरे पूर्वी राजस्थान के राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है। 11 अक्टूबर की शाम को वैर थाना क्षेत्र में हुए हमले के बाद जब अतर सिंह भड़ाना और उनके बॉडीगार्ड बुरी तरह घायल हुए, तो उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद तुरंत जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया। लेकिन वैर से 156 किलोमीटर दूर जयपुर ले जाते समय दौसा के महुवा के पास रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। इस दुखद अंत के बाद अब स्वास्थ्य तंत्र की रेफरल नीति और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर फिर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि अगर उन्हें पास के संभागीय अस्पताल में त्वरित और एडवांस इलाज मिलता, तो क्या उनकी जान बचाई जा सकती थी?
घटनास्थल वैर से जयपुर की दूरी सड़क मार्ग से लगभग 156 किलोमीटर है, जिसे तय करने में एम्बुलेंस को भी कम से कम 3 घंटे का समय लगता है। गंभीर रूप से घायल मरीज के लिए यह तीन घंटे का सफर किसी भी लिहाज से सुरक्षित नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब खून बह रहा हो और अंदरूनी चोटें गंभीर हों।
दूसरी ओर, वैर से भरतपुर जिला मुख्यालय की दूरी मात्र 45 किलोमीटर है, जहां पहुंचने में बमुश्किल सवा घंटे का समय लगता है। ऐसे में भरतपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल को नजरअंदाज कर सीधे 3 घंटे दूर जयपुर भेजने के फैसले ने राज्य के स्वास्थ्य ढांचे पर कई असहज करने वाले सवाल खड़े कर दिए हैं।
भरतपुर शहर के सुभाष नगर में स्थित राज बहादुर मेमोरियल (RBM) अस्पताल पूरे भरतपुर संभाग का सबसे बड़ा सरकारी और जिला अस्पताल है। यह अस्पताल न केवल भरतपुर बल्कि आसपास के करौली, धौलपुर और सवाई माधोपुर जिलों के मरीजों के लिए मुख्य चिकित्सा केंद्र का काम करता है।
आरबीएम अस्पताल में सामान्य चिकित्सा से लेकर आपातकालीन सेवाओं, विभिन्न प्रकार के जटिल ऑपरेशनों, एडवांस्ड डायग्नोस्टिक सेंटर और गहन चिकित्सा इकाई (ICU) की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
इतना ही नहीं, आरबीएम अस्पताल परिसर में 250 बिस्तरों वाले आधुनिक 'सुपर स्पेशियालिटी ब्लॉक' भी है, जिसका वर्चुअल लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वर्ष पहले ही किया था। इतने बड़े चिकित्सा इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद, किसी भी अति-गंभीर स्थिति में मरीज को वहां ले जाने के बजाय जयपुर रेफर कर देना स्थानीय चिकित्सा व्यवस्था की कार्यक्षमता पर सीधे सवाल उठाता है।
पूर्वी राजस्थान के ग्रामीण और उप-खंडीय इलाकों में जब भी कोई बड़ा हादसा, गोलीबारी या हिंसक हमला होता है, तो स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों से मरीजों को सीधा 150 से 200 किलोमीटर दूर जयपुर के एसएमएस अस्पताल रेफर करने की परिपाटी सी बन गई है।
रेफरल का डर या विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी: स्थानीय स्तर पर डॉक्टरों द्वारा जोखिम न लेने और उच्च स्तर पर तुरंत केस ट्रांसफर करने की प्रवृत्ति एक बड़ी वजह है।
उपकरणों की मौजूदगी पर संचालन का सवाल: भले ही जिला स्तर पर 250 बेड के सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक बन जाएं, लेकिन जब तक वहां चौबीसों घंटे न्यूरोसर्जन, कार्डियोलॉजिस्ट और वैस्कुलर सर्जन जैसे विशेषज्ञ डॉक्टर तथा आपातकालीन वेंटिलेटर सपोर्ट स्टाफ मुस्तैद नहीं होंगे, तब तक कागजी दावे धरातल पर दम तोड़ते रहेंगे।
जयपुर पहुंचते-पहुंचते हो जाती है मौत: रास्ते का लंबा सफर ही कई बार अत्यधिक रक्तस्राव और शॉक के कारण मरीज के जीवन का अंत कर देता है। अतर सिंह भड़ाना के मामले में भी ठीक यही हुआ।
अतर सिंह भड़ाना के निधन ने केवल एक राजनीतिक हस्ती को ही नहीं छीना, बल्कि राजस्थान के दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों की लचर आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था की पोल भी खोल दी है। आम जनता अब यह पूछने पर मजबूर है कि क्या संभाग स्तर पर बने करोड़ों रुपये के सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक केवल नाम मात्र के लिए हैं?
यदि 45 किलोमीटर दूर स्थित एक संभागीय जिला अस्पताल में किसी पूर्व विधायक जैसी वीआईपी हस्ती को तुरंत इमरजेंसी स्टेबलाइजेशन और क्रिटिकल केयर नहीं मिल सकती, तो आम नागरिक की सुरक्षा और इलाज का क्या भरोसा? अगर प्राथमिक घंटे (Golden Hour) के दौरान भड़ाना को भरतपुर के आरबीएम अस्पताल में ही विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा तुरंत स्टेबलाइज कर दिया गया होता, तो शायद उन्हें 156 किलोमीटर दूर जयपुर ले जाने की नौबत ही नहीं आती और उनकी जान बचाई जा सकती थी।
अब जरूरत इस बात की है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग अपनी रेफरल पॉलिसी में सुधार करें ताकि किसी मरीज को केवल सफर के कारण अपनी जान न गंवानी पड़े।
अतर सिंह भड़ाना मौत मामले में पुलिस की भी लापरवाही सामने आई है। सात दिन से लगातार ग्रामीणों व लीज संचालक के बीच विवाद चल रहा था। दो बार धरने पर बैठे लोगों को समझाइश के दौरान कहासुनी भी हुई थी। इसको लेकर पुलिस को भी सूचना दी गई थी, लेकिन पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया। एक दिन पहले भी करीब 50-60 लोगों के लीज पर टॉर्च लेकर सर्च करते हुए वीडियो वायरल हुआ था।
सीआई धीरेंद्र सिंह के अनुसार, ग्रामीणों और क्रशर संचालक के बीच पिछले दो वर्षों से विवाद चल रहा था। विवाद के चलते ग्रामीणों की ओर से क्रेशर के विरोध में धरना भी दिया जा रहा था। खुद धौलपुर सांसद भजनलाल जाटव भी ग्रामीणों के साथ मिलकर विरोध कर चुके हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि बयाना के पूर्व विधायक अतर सिंह भड़ाना की पत्नी कमलेश भड़ाना गांव में अवैध तरीके से खनन करवा रही हैं। लीज पर दिन रात ब्लास्ट किए जाते हैं। खनन का काम करने वाले कर्मचारी जंगली जानवरों का शिकार कर रहे हैं। धमाकों की वजह से रात के समय में ग्रामीण सो नहीं पाते।