- शायद पीढियां कचरा घर के नाम से जानेंगी
भरतपुर. नौंह गांव का नाम जुबां पर आते ही जेहन में पुरानी सभ्यता हिलोरे मारती है, लेकिन अब सभ्यता यह सड़ांध के बीच खतरे में है। नौंह गांव की प्राचीन सभ्यता से नगर निगम का कोई वास्ता नजर नहीं आ रहा है। अब नई पहचान की बात करें तो नौंह का नाम कचरा घर के रूप में सामने आ रह है। नगर निगम गांव के इतिहास को मिटाने पर ही आमादा नजर आ रही है। यही वजह है कि लोगों की वर्षों की पुकार के बाद उनकी सुनवाई नहीं हो रही।
नगर निगम ने नौंह गांव में करीब 50 बीघा भूमि पर कचरा घर बना दिया है। यहां प्रतिदिन सैकड़ों मन कचरा फेंका जा रहा है। इससे यहां खिलखिलाते खेत अब मुस्कुराना भूल गए हैं तो लोगों का मक्खी-मच्छरों से जीना दुश्वार हो रहा है। आलम यह है कि निगम प्रशासन की मेहरबानी से किसानों के बिना बोए ही खेतों में पॉलिथिन के रूप में जहर खुद-ब-खुद उजप रहा है। नौंह स्थित कचरा प्लांट गांव में वर्ष 2004 से संचालित है। शुरुआत कुछ दिन तक यह ठीक चला और यहां कचरा निस्तारण के लिए मशीनरी भी स्थापित कर दी गईं, लेकिन अब यह मशीनरी जमीदोंज सी नजर आ रही हैं। नगर निगम ने कचरे से खाद बनाकर गांव वालों को उपलब्ध कराने का दावा किया था, लेकिन किसानों को फसल उपजाऊ बनाने के लिए बजाय खाद के भूमि को बंजर बनाने वाली पॉलिथिन मिल रही है। लोगों का आरोप है कि यह कचरा घर अब बीमारियों का अड्डा साबित हो रहा है।
यह गांव हो रहे प्रभावित
नौंह स्थित कचरा घर से नौंह के अलावा मेहंदीबाग, नगला अस्तावन, नगला लोधा, मडरपुर, गामरी, नगला केवल, पीरनगर, बछामदी सहित अन्य गांवों के लोग खासे प्रभावित हो रहे हैं। इन गांवों में पहले की अपेक्षा अब मच्छर-मक्खियों का प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ गया है। आलम यह है कि घरों से मक्खियां निकलने का नाम नहीं ले रही हैं।
यह कहता है गांव नौंह का इतिहास
माना जाता है कि जिले की सबसे पुरानी सभ्यता नौंह की है, जो करीब तीन हजार साल पुरानी है। नौंह गांव में रतनचंद अग्रवाल द्वारा किए गए उत्खनन में नोंह से ग्रेवियर, घूसर, मृद्राण्ड, काले पॉलिशयुक्त बर्तन के अवशेष मिले, जो ईसा से 900 वर्ष पूर्व हस्तिनापुर में भी ऐसे बर्तन पाए गए हैं। नौंह में महाभारत काल के तीरों की नोंक आखेट, शिकार व युद्ध दर्शाती है। नौंह में एक स्थान पर ही 16 रिंग बेल का होना सिंचाई एवं पेयजल व्यवस्था को दर्शाता है। पात्रों पर ब्रह्मी लिपि में लेख भी अंकित हैं। नौंह के उत्खनन से सेंड स्टोन की यक्ष और यक्षणिओं की मूर्तियां मिली हैं। एक विशाल यक्ष मूर्ति जिसे गांव के लोग जाख बाबा कहते हैं, जिसकी आज भी गांव मं पूजा होती है। गांव में गाय-भैंस के ब्याहने के बाद उस जानवर का पहला दूध पूजा के रूप में जाख बाबा की मूर्ति पर चढ़ाया जाता है। टीले के ऊपर एक साढ़े तीन फीट ऊंचाी यक्षिणी की मूति भी लगी हुई है। इसे गांव वाले चमड़ा के नाम से पूजन करते हैं। नौंह में साल 1963 में उत्खनन में ढेरों अवशेष मिले थे।
अब पार्षद ने दी आंदोलन की चेतावनी
गांव नौंह में कचरे से परेशान लोगों की पीड़ा वार्ड 50 के पार्षद रामेश्वर सैनी ने कई बार नगर निगम के सदन में उठाई है, लेकिन उन्हें आश्वासन के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हो सका है। आलम यह है कि नौंह कचरा संयंत्र काफी समय पहले ही खराब हो चुका है। कचरा घर की चारदीवारी नहीं होने के कारण पॉलिथिन उड़कर किसानों के खेतों में पहुंच रही है, जो उपजाऊ भूमि को बंजर बना रही हैं। कचरे का पहाड़ बनने से इसमें मक्खी-मच्छर पैदा हो गए हैं। इससे ग्रामीणों का जीना मुहाल हो रहा है। इससे क्षेत्र के करीब एक दर्जन गांव प्रभावित हो रहे हैं। पार्षद बताते हैं कि वह इस समस्या को लगातार 2019 से निगम बोर्ड की बैठक में उठा रहे हैं। पार्षद ने 19 अप्रेल को कचरा घर की समस्या को लेकर सदन में धरना भी दिया गया। इसके बाद भी कचरा घर के निस्तारण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। पार्षद का आरोप है कि भरतपुर के मेयर अभिजीत कुमार सोशल मीडिया पर भरतपुर में बड़े-बड़े विकास करने के दावे कर रहे हैं, जबकि उनका ध्यान वार्ड नंबर 50 में स्थित कचरा घर की ओर नहीं है। मेयर हर बोर्ड बैठक में करोड़ों रुपए के प्रस्तावों को पास करा रहे हैं, जबकि वार्डों में अभी भी सड़क, नाली, रोड लाइट की लोगों को जरूरत है। इस ओर मेयर का ध्यान नहीं है।
फैक्ट एक नजर में
- 15-20 गांव प्रभावित हैं कचरा घर से
- 100 बीघा किसानों की जमीन हो रही प्रभावित
- 50-60 ट्रॉली कचरे की आती हैं प्रतिदिन
- 65 टेम्पो हर रोज लाते हैं शहर से कचरा
- 2004 से कचरा डल रहा है नौंह में
-2007 में कचरा संयंत्र प्लांट लगाया