-घर जाने को नहीं बचे पैसे तो टोल के पास कबाडऩुमा कमरे में ली पनाह-जिला कलक्टर ने कार्यवाहक पीएमओ को दुबारा जांच के दिए आदेश
भरतपुर. सरकारी बदइंतजामी की पीर सह चुकी सुनीता के मर्ज को अब तंगहाली और बढ़ा रही है। निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराने के बाद अब उसके पास घर जाने लायक भी पैसे नहीं बचे हैं। ऐसे में उसने टोल प्लाजा के पास एक कबाडऩुमा कमरे में पनाह ली है। यहां सुनीता अपनी मासूम बेटी के साथ तंगहाली में रह रही है। सरकारी सिस्टम की पीड़ा झेल चुकी सुनीता के पास भामाशाहों की मदद भी नहीं पहुंची है। वहीं दूसरी ओर जिला कलक्टर नथमल डिडेल के सामने मामला सामने आने के बाद उन्होंने कार्यवाहक पीएमओ से प्रकरण की दुबारा रिपोर्ट मांगी है। साथ ही पत्रिका से भी महिला की मदद के लिए पता आदि की जानकारी प्राप्त की है।
सुनीता ने हाल ही निजी अस्पताल में टूटे पैर का ऑपरेशन कराया है। इसमें करीब 25 हजार रुपए से अधिक का खर्चा आया है। चिकित्सक ने उसे छह दिन बाद फिर से अस्पताल बुलाया है। सुनीता को घर पहुंचाने के एवज में टैक्सी चालक ने भाड़े के 1500 रुपए मांगे थे, जो उसके पास नहीं थे। ऐसे में उसने यहीं रुकने का फैसला किया। अब वह लुधावई टोल के पास रह रही है ताकि चिकित्सक को यहीं रहकर दिखा सके और पैसों का इंतजाम होने के बाद अपने घर जा सके। उल्लेखनीय है कि करीब सात दिन पूर्व खेरली के पास सड़क दुर्घटना में सुनीता का पैर टूट गया था। यहां उसे इलाज के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी। अस्पताल प्रशासन की अनदेखी के चलते उसे निजी अस्पताल में उपचार कराना पड़ा था। इसके लिए उसने अपने गहने गिरवी रखकर पैसों का इंतजाम किया था। खास बात यह है कि सुनीता की पीर का मामला पत्रिका में प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद अस्पताल प्रशासन ने आनन-फानन में मामले की जांच करा दी और खुद को क्लीन चिट दे दी।
रिपोर्ट सही या गलत?
अस्पताल प्रशासन ने मामले की जांच कराकर रिपोर्ट जिला कलक्टर के यहां पेश की है। इस मामले में जिला प्रशासन की ओर से अभी तक किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई है। अस्पताल प्रशासन की रिपोर्ट में कितनी सच्चाई है यह पीडि़ता के बयानों के बाद भी पता चल सकेगा, लेकिन जिला प्रशासन की चुप्पी के चलते अभी तक इसका खुलासा नहीं हो सका है।
सरकारी अस्पतालों में चलता है कमीशन का खेल
इस प्रकरण के सामने आने के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन कराने के नाम पर कमीशनबाजी का खेल थम क्यों नहीं रहा है। जांच का जिम्मा खुद उनको दिया जाता है जो कि दोषी होते हैं। सफलता का श्रेय लेने वाले व छोटी-छोटी उपलब्धि का तमगा लेने वाले अफसर क्यों शांत बने हुए हैं। पीडि़त सुनीता का आरोप है कि आरबीएम अस्पताल में उससे पैर के ऑपरेशन के लिए दस हजार रुपए मांगे। साथ ही यह डर भी बताया गया कि उसका पैर काटना पड़ सकता है। हालांकि यह बातें अस्पताल प्रशासन की ओर से न कहकर किसी अन्य व्यक्ति ने कही थी। बताते हैं कि अस्पताल में सक्रिय किसी दलाल गिरोह के सदस्य ने ही महिला मरीज से रुपए मांगे थे। करीब ढाई साल पहले भी आरबीएम अस्पताल में हड्डी का ऑपरेशन कराने के नाम पर कमीशनबाजी व निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराने के लिए दबाव बनाने का मामला सामने आया था।
-महिला का पता आदि की जानकारी की गई है। संस्था या किसी अन्य माध्यम से महिला की आर्थिक मदद की जाएगी। इस बारे में जांच भी कराई जा रही है। पीएमओ से भी जानकारी ली गई है।
नथमल डिडेल
जिला कलक्टर
-जिला कलक्टर ने दुबारा प्रकरण की जांच के आदेश दिए हैं। महिला की तलाश की जा रही है। इस बारे में जिला कलक्टर से भी बात हो चुकी है।
डॉ. केसी बंसल
कार्यवाहक अधीक्षक आरबीएम अस्पताल