भरतपुर

पूर्व कर्मचारी बोले: जिस कंपनी को अपना माना, उसी ने कर दिया बेघर

-सिमको प्रबंधन व पूर्व कर्मचारियों के बीच विवाद का मामला-अब जिला कलक्टर को ज्ञापन देकर बताया प्रकरण

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Jul 31, 2020
पूर्व कर्मचारी बोले: जिस कंपनी को अपना माना, उसी ने कर दिया बेघर

भरतपुर. दशकों से चला आ रहा सिमको फैक्ट्री व पूर्व कर्मचारियों के बीच विवाद का मामला अब उलझता जा रहा है। इस मामले को लेकर शुक्रवार को सिमको बचाओ संघर्ष समिति की ओर से जिला कलक्टर को ज्ञापन देकर विस्तार से प्रकरण के बारे में बताया गया। ज्ञापन में उल्लेख किया है कि सिमको बैगन फैक्ट्री निर्माण के लिए पांच अक्टूबर 1956 की अनुपालना में तत्कालीन जिला कलक्टर की ओर से 29 अक्टूबर 1956 को सैंट्रल इंडिया मशीनरी मैन्यू फैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड के पक्ष में 470 बीघा एक बिस्वा भूमि आवंटित कर 24 सितंबर 1966 को तत्कालीन जिला कलक्टर एवं उद्योग विभाग की ओर से 99 वर्षीय लीज पर 10 शर्तों के साथ लीज डीड निष्पादित कराई गई। अब फैक्ट्री प्रबंधन की आरे से शर्तों की अवहेलना कर जमीन को खुर्द बुर्द किया जा रहा है। वर्ष 2000 को फैक्ट्री लॉकडाउन हुई थी जो लॉकडाउन 2008 तक रहा है। श्रमिकों को क्षतिपूर्ति मुआवजा न देकर आवश्यक रूप से 1669 श्रमिकों व काफी संख्या में वारिसानों को स्थायी नौकरी देने का वायदा किया गया था। अब तक श्रमिकों को क्षतिपूर्ति का भुगतान नहीं किया गया व न समझौते के अनुसार श्रमिकों को स्थायी सेवा में नहीं लिया गया। इसके अतिरिक्त श्रमिकों के आवासों की मरम्मत कर उन्हें क्वार्टरों में रहने के लिए दिए जाने का वादा भी किया, लेकिन अब उन क्वार्टरों को भी तोड़ा जा रहा है। प्रतिनिधिमंडल में नगर निगम के पूर्व नेता प्रतिपक्ष इंद्रजीत भारद्वाज, समिति संयोजक कृपाल सिंह ठैनुआ, जिला महामंत्री नरेंद्र गोयल, भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष गिरधारी तिवारी, पूर्व जिला महामंत्री शिवराज तमरौली, सह संयोजक अशोक जैन, संतोष चतुर्वेदी, अनुराग चाहर आदि शामिल थे।

जिस समय समझौता हुआ उस समय अस्तित्व में ही नहीं थी टीटागढ़

प्रतिनिधिमंडल ने जिला कलक्टर को इस प्रकरण में कुछ आवश्यक बिंदुओं से भी अवगत कराया। उन्होंने कहा कि पांच मार्च 2008 को राजस्थान सरकार, टीटागढ़ बैगन कोलकाता, सिमको की यूनियन के मध्य समझौता हुआ था। इसके तहत 14 जनवरी 2008 को फैक्ट्री खोली गई। पांच मार्च को जब राजस्थान सरकार की ओर उक्त समझौता निष्पादित कराया गया, उस समय टीटागढ़ बैगन लिमिटेड कोलकाता का राजस्थान में कोई अस्तित्व नहीं था व न सिमको के विवाद में कहीं भी पक्षकार थी। सवाल यह भी उठता है कि टीटागढ़ बैगन लिमिटेड बीआईएफआरआई दिल्ली के निर्णय के उपरांत अस्तित्व में आई थी। पांच मार्च 2008 श्रमिकों के साथ हुआ समझौता एक जांच का विषय है। राजस्थान सरकार व श्रमिक यूनियनों को धोखे में रखकर टीटागढ़ बैगन लिमिटेड की ओर से किया गया था, उसको लेकर टीटागढ़ कंपनी दिल्ली में अपना क्लेम करने पहुंची थी, लेकिन राजस्थान सरकार व उद्योग विभाग की ओर से कोई भी अधिकृतअधिकारी इसमें उपस्थित नहीं था। कंपनी की ओर से षडयंत्र के तहत किसी अन्य व्यक्ति को उद्योग विभाग प्रतिनिधि बनाकर पेश कर अपने पक्ष में निर्णय पारित कराया गया।

Published on:
31 Jul 2020 08:24 pm
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