CG News: दुर्ग शहर की ऐतिहासिक धरोहर और 116 वर्ष पुरानी विरासत हिंदी भवन देखरेख के अभाव में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। दुर्ग का ‘दिल्ली दरवाजा’ कहलाने वाला ब्रिटिश कालीन यह भवन वर्षों से प्रशासनिक अनदेखी का शिकार है।
CG News: दुर्ग शहर की ऐतिहासिक धरोहर और 116 वर्ष पुरानी विरासत हिंदी भवन देखरेख के अभाव में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। दुर्ग का ‘दिल्ली दरवाजा’ कहलाने वाला ब्रिटिश कालीन यह भवन वर्षों से प्रशासनिक अनदेखी का शिकार है। सुरक्षा और नियमित रखरखाव के अभाव में इमारत की हालत लगातार जर्जर होती जा रही है। विडम्बना यह है कि प्रशासन आवश्यकता पडऩे पर इस भवन का उपयोग तो करता है, लेकिन काम पूरा होते ही इसे फिर उपेक्षा के हाल में छोड़ दिया जाता है।
इस ऐतिहासिक इमारत का अतीत बेहद गौरवशाली रहा है। ब्रिटिश शासनकाल में 17 नवंबर 1911 को छत्तीसगढ़ डिवीजन के तत्कालीन कमिश्नर एफ.टी. फिलिप्स ने इसकी आधारशिला रखी थी। भवन का निर्माण 19 दिसंबर 1915 को पूर्ण हुआ और इसका उद्घाटन तत्कालीन कमिश्नर एम.एल. लॉरी ने किया था। प्रारंभ में इसे एडवर्ड मेमोरियल हॉल के नाम से जाना जाता था, जबकि आम बोलचाल में इसे ‘दिल्ली दरवाजा’ कहा जाता था।
पुरातात्विक महत्व की संरचनाओं के संरक्षण के लिए लंबे समय से कार्य कर रहे सजग प्रयास के अरुण गुप्ता का कहना है कि शहर में हिंदी भवन के अलावा भी कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व की संरचनाएं मौजूद हैं। दुर्भाग्यवश, पुरातत्व विभाग ने अब तक हिंदी भवन सहित अनेक धरोहरों की ओर समुचित ध्यान नहीं दिया है। ऐसी विरासतों का संरक्षण और नियमित देखरेख नगर निगम की प्राथमिकता होनी चाहिए।
इस इमारत का अंतिम व्यवस्थित जीर्णोद्धार वर्ष 2009 में तत्कालीन महापौर एवं सांसद सरोज पांडेय ने व्यक्तिगत रुचि लेकर कराया था। इसके बाद यहां संभाग आयुक्त कार्यालय संचालित हुआ। संभाग आयुक्त कार्यालय के अन्यत्र स्थानांतरित होने के बाद भवन लगभग उपेक्षित हो गया। वर्तमान में भवन का अधिकांश हिस्सा खाली पड़ा है और केवल एक-दो कक्षों का ही उपयोग निगम कार्यालयों के लिए किया जा रहा है।