अब तो दो ही बातें है या तो बुद्धिपूर्वक व्यक्ति महायंत्रों के प्रचुर आविष्कार प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाए या फिर प्रकृति प्रतिबन्ध लगाएगी तो बहुत कष्ट होगा। उसके लिये उद्यत रहें। प्रकृति अपने आप में क्रान्ति करती है क्योंकि भगवान की शक्ति प्रकृति है। प्रकृति के परिकर पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पवन आदि हैं ।
भिलाई@Patrika. कोरोना वायरस रोकने देशभर में लॉकडाउन और लोगों को बचाने बरती जा रही सावधानी पर पुरीपीठाधिश्वर श्रीमज्जगदगुरु शंकराचार्य श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी जनता को संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि महायान्त्रिक युग में तात्कालिकी उपयोगिता ने किसी भी उत्तम उपलब्धि के लिए, जितना धैर्य चाहिए उसका विलोप कर दिया है। इसलिये मानव जीवन की अपूर्वता महत्ता पर ही एक प्रकार से ग्रहण लग चुका है। उस पर विचारकों को विचार करना चाहिए। अब तो दो ही बातें है या तो बुद्धिपूर्वक व्यक्ति महायंत्रों के प्रचुर आविष्कार प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाए या फिर प्रकृति प्रतिबन्ध लगाएगी तो बहुत कष्ट होगा। उसके लिये उद्यत रहें। प्रकृति अपने आप में क्रान्ति करती है क्योंकि भगवान की शक्ति प्रकृति है। प्रकृति के परिकर पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पवन आदि हैं ।
प्रकृति जब कदम उठाए उससे पहले विवेकपूर्वक मनुष्य को कदम उठाने की आवश्यकता
उन्होंने श्रीमदभगवदगीता का उद्वरण देते हुए कहा कि प्रकृति जब क्रांति का मार्ग निकालती है तो बहुत विस्फ ोटक वो मार्ग अन्यों के लिये सिद्ध होता है। प्रकृति जब कदम उठाए उससे पहले विवेकपूर्वक मनुष्य को कदम उठाने की आवश्यकता है। लोग सोच सकते हैं कि प्रकृति तो जड़ है कदम कैसे उठाती है, तो भागवत में उसका उदाहरण दिया गया चौथे स्कन्ध में। जब वेन का शासन था, तो सज्जन दाने दाने के लिये मोहताज थे और दुर्जन रबड़ी, मालपुआ से खेलते थे। पृथ्वी ने सोचा दुर्जन रबड़ी, कचौरी, मालपुऐ छकते हैं। सज्जन दाने दाने के लिये मोहताज हैं। अब सज्जन की बात तो छोड़ दो दुर्जनों को भूखे मारो। अन्न देना बंद कर दिया। भूदेवी ने अन्न देना बंद कर दिया। सज्जन तो पहले ही मर रहे थे। अन्न के बिना दुर्जन भी मरने लगे। चांदी सोना तो खाके जीवित नहीं रह सकते थे।
प्रकृति क्रान्ति का मार्ग निकाले उसके पहले ही हमको सतर्क और सावधान होना चाहिए
ऐसे ही देहरादून में मैं था। श्री गंगा जी को लेकर एक गोष्ठी में किसी ने कह दिया हिन्दूओं में दमखम नहीं है गंगा की रक्षा कर सकें। हम ठेकेदार के ऐजेंट हैं विद्युत परियोजना, नहर परियोजना, सुरंग परियोजना आदि के माध्यम से हमें गंगा जी को जिस दशा जिस दिशा तक पहुंचाना है पहुंचाते रहेंगें हमको कोई चुनौती प्राप्त नहीं है। सरकार हमारे साथ है, हिन्दूओं से कोई चुनौती प्राप्त नहीं है। मेरे मुंह से निकल गया प्रकृति कैसे मार्ग निकालती है जिसके साथ तुम अन्याय कर रहे हो। वो गंगा ही कैसे मार्ग निकालती है तुम देख लेना। केदारनाथ की घटना मालूम है ना? इसका मतलब क्या होता है? जब मनुष्य स्वस्थ क्रांति नहीं कर पाता या उधर ध्यान नहीं देता तो प्रकृति जो क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त करती है, उसमें बड़े बड़े भी चारोंखाने चित्त हो जाते हैं। प्रकृति जो भगवान की शक्ति है अपने परिकर उर्जा के चारों स्त्रोत पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पवन के माध्यम से स्वस्थ क्रान्ति का मार्ग निकाले उसके पहले ही हमको सतर्क और सावधान होना चाहिए। जानकारी राष्ट्र उत्कर्ष अभियान के प्रांतीय संयोजक देवेश मिश्रा ने दी।
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