भीलवाड़ा की यशोदाओं ने बताई दुग्धदान की कहानी
भीलवाड़ा।
शहर के गांधीनगर की खुशनूर हो या भवानीनगर की रेशमा, आज भी यशोदा की भूमिका निभा रही हैं। इनके खुद के बच्चे हैं लेकिन जरूरत पडऩे पर उनके हिस्से का दूध एेसे बच्चों को पिलाया, जिनके मां नहीं थी या माता के दूध नहीं उतर रहा था। दुग्धदान करने वाली इन माताओं और आंचल मदर मिल्क बैंक को लेकर जन्माष्टमी पर विशेष रिपोर्ट।
खुशनुर ने बताया कि उसके सात माह में २१ जून २०२१ को जुडवां बच्चे हुए लेकिन स्थिति प्रसव के तीन दिन तक सीने में दूध नहीं उतरा। इन तीन दिन खुशनुर के दोनो बेटों को अस्पताल की यशोदाओं की ओर से आंचल मदर मिल्क बैंक से दूध पिलाया जाता रहा। जब पहली बार इनके दूध बनने लगा तो यशोदाओं ने बताया कि उन्हें दूधदान करने को प्रेरित किया। कहा कि आपके बच्चों की तरह ही किसी और बच्चे को इसकी जरूरत है। इसके अगले दिन से ही खुशनुर ने आंचल मदर मिल्क बैंक में दुग्धदान शुरू किया। वह एक माह अस्पताल में भर्ती रही। इस दौरान रोजाना मदर मिल्क बैंक में दूधदान करने आती रही। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी वह लगातार अपने परिवार जनों की मदद से अस्पताल आकर दूध का दान करती थी। खुशनुर अब तक २३५० एमएल दूध का दान कर चुकी है, जिसने कई बच्चों के लिए अमृत का काम किया। बकौल खुशनुर, 'मां तो मां होती है। वह किसी भी बच्चे को भूख से बिलखता नहीं देख सकती है। फिर मेरे तो दो बच्चे थे। उसके बाद भी दूध आने पर वह मदर मिल्क में मशीनों के माध्यम से दूध का दान करती थी।Ó
मदर मिल्क प्रभारी डॉ. सरिता काबरा का कहना है कि मदर मिल्क के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो कई कृष्ण व उन्हें पालने वाली यशोदा आज भी मौजूद है। इसी प्रकार भवानीनगर की रेशमा के भी जुड़वां बच्चे हुए। वह करीब २ हजार एमएल दूध का दान कर चुकी। मिल्क बैंक मैनेजर प्रेम जाट व ऑफिस इंचार्ज रोशलीन जोसफ का कहना है कि हर धात्री माता एक बार भी दूध दान कर दे तो कोई नवजात भूखा नहीं रहेगा।