भीलवाड़ा

अशुभ से निवृत्ति और शुभ में प्रवृत्ति ही सम्यक चारित्र: मुनि प्रणीत सागर

आरके कॉलोनी स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनि प्रणीत सागर ने श्रद्धालुओं को दी आत्ममंथन की प्रेरणा

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May 05, 2026
अशुभ से निवृत्ति और शुभ में प्रवृत्ति ही सम्यक चारित्र: मुनि प्रणीत सागर

अशुभ प्रवृत्तियों से दूर होकर शुभ कर्मों में प्रवृत्त होना ही सम्यक चारित्र का वास्तविक स्वरूप है। जब मनुष्य जीवन में इस भेद को गहराई से समझ लेता है, तब उसका जीवन स्वतः आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर हो जाता है। यह विचार मुनि प्रणीत सागर ने आरके कॉलोनी स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।

शरीर में विराजमान है भगवान स्वरूप आत्मा

मुनि ने सम्यक चारित्र की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि जिस प्रकार पत्थर के भीतर सोना, दूध में घी और तिल में तेल छिपा रहता है, ठीक उसी प्रकार इस भौतिक शरीर के भीतर आत्मा विराजमान है। यह आत्मा स्वयं शिव और भगवान स्वरूप है। विडंबना यह है कि जब मनुष्य शरीर के सुख-साधनों जैसे अधिक भोजन, श्रृंगार और इन्द्रिय भोग में लिप्त हो जाता है, तो वह अनजाने में अपनी ही आत्मा का अपकार करता है। इस सत्य को जानने और समझने वाला व्यक्ति ही सम्यक चारित्र को प्राप्त करता है।

आत्मा का स्वभाव है हमेशा ऊपर उठना

उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि आत्मा का मूल स्वभाव सदैव ऊर्ध्वगामी (ऊपर उठने वाला) होता है। जिस प्रकार तिनका, लकड़ी और तेल पानी में डूबने के बजाय हमेशा ऊपर ही तैरते हैं, उसी प्रकार आत्मा भी अपने शुद्ध स्वरूप में ऊपर उठने की प्रवृत्ति रखती है।

हर कार्य से पहले करें खुद से सवाल

मुनि ने उपस्थित श्रावकों को आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हुए कहा कि कोई भी क्रिया करने से पूर्व स्वयं से प्रश्न अवश्य करना चाहिए कि यह कार्य किस उद्देश्य से किया जा रहा है। मंदिर जाना हो, भोजन करना हो या धन अर्जित करना इन सभी के पीछे का लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने बताया कि जब व्यक्ति यह आत्ममंथन शुरू कर देता है, तब उसकी सोच सांसारिक मोह-माया से हटकर आत्मा की ओर केंद्रित होने लगती है।

लालसा ही संसार से बांधे रखती है

वर्तमान भौतिकवादी युग पर चिंता व्यक्त करते हुए मुनि ने कहा कि आज मनुष्य के पास जीवन-यापन के लिए पर्याप्त साधन मौजूद हैं, फिर भी उसकी इच्छाएं और तृष्णा समाप्त नहीं होतीं। यही लालसा उसे संसार के चक्र में बांधे रखती है। सम्यक चारित्र को अपनाकर ही मनुष्य इन बंधनों से मुक्त हो सकता है और आत्मिक शांति व मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

Published on:
05 May 2026 09:38 am
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