खाण्डल विप्र छात्रावास में श्रीमद भागवत कथा में भगवान संग खेली होली
भीलवाड़ा।
जयकारों के बीच चंग की थाप पर भजनों पर भगवान संग फूलों से होली खेलते श्रद्धालु चोरों तरफ से पुष्पवर्षा करते भक्तगण मानो जैसे पूरा पांडाल बृजमय हो गया हो। अवसर था श्री डूंगरगढ़ नागरिक सेवा समिति के तत्वावधान में खाण्डल विप्र छात्रावास में श्रीमद भागवत कथा में भगवान संग खेली गई होली का। कथा के दौरान श्रद्धालु भजनों पर जमकर थिरके।
कथावाचक पूजा जोशी ने कहा कि अहंकार आने के बाद ब्रह्माजी का मोह भी भगवान ने भंग कर दिया। अत: मनुष्य जीवन में अहंकार को त्यागना जरूरी है। वे श्री डूंगरगढ़ नागरिक सेवा समिति के तत्वावधान में खाण्डल विप्र छात्रावास में श्रीमद भागवत कथा का वाचन कर रही थी। उन्होंने श्रीकृष्ण लीला, पूतना मोक्ष, माखन चोरी लीला, भगवान के नामकरण संस्कार व गिरिराज प्रसंग सहित कई लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि श्रीकृष्ण सभी ग्वालों को माखन खिलाकर फिर स्वयं खाते है, अत: हमें भी भगवान से यही शिक्षा लेनी चाहिए।
समिति के सचिव शांतिप्रकाश मोहता ने बताया कि कथा में गिरिराज की झांकी के साथ ही छप्पन भोग की झांकी सजाकर छप्पन भोग लगाया गया। वहीं कथा के उपरांत श्री डूंगरगढ़ नागरिक सेवा समिति के सदस्यों द्वारा चंग पर भगवान के साथ फूलों की होली भी खेली गई। जिसमें महिला मंडल द्वारा नृत्य की प्रस्तुति दी गई।
माता-पिता की सेवा करना ही साक्षात प्रभु की सेवा करना
माता-पिता की सेवा करना साक्षात प्रभु की सेवा करना ही है। भगवान के साक्षात प्रतिमूर्ति माता-पिता है। यदि रोज उठकर माता-पिता को प्रणाम कर उनकी आज्ञा का पालन करना भगवान की आज्ञा का अनुसरण करने के समान है। उनकी सेवा सारी सेवाओं से बढ़कर है। ये विचार कथा चाचक प्रकाशानंद महाराज ने कहे। वे श्रीराम कथा महोत्सव सेवा समिति ओ सेक्टर आजाद नगर के तत्वावधान में अंबेश हॉस्पीटल के सामने संगीतमय श्रीरामकथा में माता-पिता की सेवा प्रसंग पर बोल रहे थे।
उन्होंने शिव महिमा का वर्णन करते हुए कहा की शिव परमगुरु है, महायोगी है। जहां पर श्रद्धा नहीं है, वहां विश्वास हो ही नहीं सकता। कथा प्रसंग में शिव-पार्वती विवाह महोत्सव धूमधाम के साथ मनाया गया। विवाह और बारात की मनमोहक झांकी ने श्रद्धालुओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। संयोजक छगनलाल जैन ने बताया कि गोपाल शर्मा, शिवनंदन तिवाड़ी व बसंतकुमार भट्ट ने व्यासपीठ का पूजन कर कथा की शुरूआत की। वहीं बनवारी शरण काठिया बाबा ने महाआरती कर कथा को विश्राम दिया।