विभिन्न योजनाआें का जिम्मा संभालने वाले रसद विभाग का, जो अभी सात माह से मुखिया की बाट जोह रहा है।
नरेंद्र वर्मा. भीलवाड़ा।
सात साल में 16 आला अधिकारी आए लेकिन टिका कोई नहीं। ये हाल है जिले के सबसे बड़े सरकारी महकमे और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत विभिन्न योजनाआें का जिम्मा संभालने वाले रसद विभाग का, जो अभी सात माह से मुखिया की बाट जोह रहा है।
सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली की हालत सुधारने और उपभोक्ताओं को राहत देने योजनाओं का पिटारा खोलती जा रही है, लेकिन इनका क्रियांवति के लिए जिला रसद विभाग में मुखिया ही नहीं है। प्रवर्तन अधिकारी व प्रवर्तन निरीक्षक के अधिकांश पद खाली है। विभागीय मुखिया की हालत ये है कि कोई टिक नहीं पा रहा है। पहली बार वर्ष 2013 में आरएएस अधिकारी नवीन यादव को लगाया, लेकिन वे एक माह ही नहीं रहे और प्रवर्तन निरीक्षक कुलदीप तिवारी के साथ एसीबी के हत्थे चढ़े गए। सीएम ने जून 2016 में औचक निरीक्षण में लापरवाही बरतने पर डीएसओ गौतम चंद जैन व रवि यादव को निलम्बित कर दिया। इसी प्रकार महावीर यादव गत वर्ष एपीओ हो गए।
आरएएस रहे कार्यवाह डीएसओ
वर्ष 2011 में आरएएस दिनेश शर्मा व अमरसिंह कानावत, वर्ष 2011 में आरएएस सुरेन्द्र माहेश्वरी व राजकुमार सिंह, 2012 आरएएस भंवर लाल शर्मा, रौनक बैरागी व राजकुमार सिंह तथा 2016 व 17 में आरएएस प्रभा गौतम दो बार कार्यवाहक रसद अधिकारी रही। सरकार ने 2011 में छह माह ममता यादव, वर्ष 2012-13 में तीन माह व वर्ष 2014 में ग्यारह माह टीकम राम भाटी, वर्ष 2014 में लोकेश गौतम को छह माह, वर्ष 2015 में शंकर लाल को आठ माह, वर्ष 2015-16 में गौतम चंद जैन को एक वर्ष, वर्ष 2016 में ओमप्रकाश पांडे को एक माह तथा महावीर नायक को आठ माह के लिए लगाया।
सात माह से पद रिक्त
वर्ष 2011 से 2018 के बीच अधिकांश तया विभाग की कमान जिला मुख्यालय पर कार्यरत आरएएस या एडीएम व के हाथों में ही रही है। आरएएस अधिकारी महावीर प्रसाद नायक के 29 दिसम्बर 2017 के तबादले के बाद से पद रिक्त है। एडीएम सिटी राजेन्द्र सिंह कविया को अभी अतिरिक्त जिम्मा मिला है। इधर, विभाग में डीएसओ के साथ ही प्रवर्तन अधिकारी के पांच में से तीन पद खाली हैं।
10 में से 3 निरीक्षक हैं, इनमें भी दो महिला निरीक्षक अवकाश पर हैं। मीनाक्षी मीणा दो साल से गैर हाजिर है। योगिता कंवर दो माह से छुट्टी पर है। मुखिया नहीं होने व अफसरों की कमी से वितरण प्रणाली का औचक निरीक्षण, योजनाओं की क्रियांवति ढंग से नहीं हो पा रही है।