भीलवाड़ा का डंका: देश में सबसे शुद्ध है मेवाड़ की कपास, केंद्र सरकार ने प्रीमियम क्वालिटी को दिया कस्तूरी ब्रांड नाम
आप जो सूती कपड़ा पहन रहे हैं, वह किस खेत की कपास से बना है, किस मिल में उसका धागा तैयार हुआ और कहां वह कपड़ा बुना गया। अब यह सारी जानकारी सिर्फ एक क्यूआर कोड स्कैन करते ही आपके मोबाइल पर होगी। वस्त्र और कृषि मंत्रालय की संयुक्त पहल से भारतीय कपास को अब वैश्विक स्तर पर कस्तूरी कपास का नया ब्रांड नाम मिला है।
कपास की गिरती साख को बचाने, उत्पादन क्षेत्रफल बढ़ाने और किसानों को उनकी उपज का बेहतरीन दाम दिलाने के लिए भीलवाड़ा सहित राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में यह मेगा प्रोजेक्ट चल रहा है। इस प्रोजेक्ट के तहत कस्तूरी कपास के उत्पादन में करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि की गई है।
पिछले 70 सालों से भारत से कपास का निर्यात हो रहा है, लेकिन अब पहली बार सरकार ने इसे कस्तूरी नाम से एक प्रीमियम ब्रांडिंग दी है। प्रोजेक्ट के अनुसार जिस कपास में कचरे की मात्रा 2 प्रतिशत या उससे कम होगी, उसे ही कस्तूरी ग्रेड माना जाएगा। इस ग्रेड में शामिल होने के लिए कपास के रेशे की लंबाई 28 से 35 मिलीमीटर के बीच होनी चाहिए। वर्तमान में भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ और राजसमंद की कपास में 3 प्रतिशत से अधिक कचरा आ रहा है। किसानों को जागरूक किया जा रहा है कि यदि कचरा 2 प्रतिशत से कम हो जाए, तो उनकी पूरी फसल कस्तूरी ग्रेड में बिकेगी और उन्हें भारी मुनाफा होगा।
महाराष्ट्र और गुजरात में कपास की चुनाई दिहाड़ी मजदूरों से प्रति किलो के हिसाब से करवाई जाती है। इससे वहां की कपास में 5 प्रतिशत तक कचरा आ जाता है। इसके उलट, राजस्थान विशेषकर भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, ब्यावर और राजसमंद में किसान परिवार खुद हाथों से कपास चुनते हैं। इस पारिवारिक मेहनत के कारण यहां की कपास में कचरा सबसे कम करीब 3 से 3.5 प्रतिशत रहता है और क्वालिटी बेहतरीन होती है। इसी शुद्धता और भीलवाड़ा में कपास के बड़े रकबे लगभग 20 हजार हेक्टेयर को देखते हुए इसे कस्तूरी के सबसे बड़े हब के रूप में चुना गया है।
प्रीमियम क्वालिटी की तैयार कपास की खरीद सीधे भारतीय कपास निगम करेगा। इस कपास को भीलवाड़ा जिले के जिनिंग उद्योगों में भेजा जाएगा। वर्तमान में सवाईपुर में यह काम शुरू हो गया है। इसके बाद इसे गंगापुर व सहाड़ा स्थित मिलों में भी भेजा जाएगा। तैयार कपास की हर एक गांठ पर एक विशिष्ट क्यूआर कोड लगाया जाएगा। स्पिनिंग मिलों को धागा बनाते समय इस कोड को मेंटेन करना होगा। अंत में बाजार में दुकान पर टंगने वाले कपड़े पर भी वही क्यूआर कोड होगा, जो पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा।
डॉ. जीएस आमेटा, प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर सीआईटीआई-सीडीआरए