भीलवाड़ा

5 साल में बनी बालिका वधू, 13 साल बाद विरोध कर कोर्ट से विवाह कराया शून्य घोषित

प्रदेश की सबसे बड़ी कुरीति पर निर्णय बनेगा नजीर
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Jan 30, 2019
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भीलवाड़ा.

सूबे की सबसे बड़ी सामाजिक कुरीति के खिलाफ भीलवाड़ा के पारिवारिक न्यायालय ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया। इसमें एक बालिका वधू ने अपने विवाह का 13 साल बाद विरोध किया। न्यायालय ने इस विवाह को गलत ठहराते बेटी के पक्ष में फैसला सुनाया और बाल विवाह को शून्य करार (अब मान्य नहीं) दिया। फैसला आने के बाद बेटी बोली-कुरीतियों के खिलाफ मेरी इस जंग में न्यायालय ने फर्ज निभाया। अब मैं जिंदगी अपने मन से जिऊंगी। दरअसल, पारोली थाना क्षेत्र की किशोरी का परिजनों ने वर्ष-2005 में बाल विवाह करवा दिया। तब वह पांच साल की थी। दो साल पहले उसे ससुराल भेजा। तब महज 15 साल थी। वह बाल विवाह से नाखुश थी। ससुराल वाले भी प्रताडि़त करने लगे। आखिर उसने बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाई।

15 साल बड़ा दूल्हा
बाल विवाह के खिलाफ बेटी की जंग इसलिए भी जरूरी थी कि विवाह के समय उसकी उम्र पांच साल थी जबकि दूल्हा बीस साल का था। अब दूल्हे की उम्र उससे दुगनी हो गई।

आसान नहीं थी राह, परिजन भी खिलाफ, समिति बनी मददगार
बाल विवाह के खिलाफ खड़ी हुई किशोरी की राह आसान नहीं थी। उसके परिजन भी साथ नहीं थे। लेकिन किशोरी ने हिम्मत नहीं हारी। 12 जुलाई 2018 को बाल कल्याण समिति अध्यक्ष सुमन त्रिवेदी से मिली व सारा घटनाक्रम बताया। जब वह आवाज मुखर कर रही थी। उसकी उम्र साढ़े 17 साल थी। समिति ने उसकी हौसला अफजाई की।


44 दिन में निर्णय, पति नहीं आया तो एक तरफा फैसला
समिति मामले को अदालत ले गई। 17 दिसम्बर 2018 को बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम की धारा-3 के तहत किशोरी की ओर से पारिवारिक न्यायालय में वाद दायर किया। न्यायाधीश मुकेश भार्गव ने किशोरी के पति को नोटिस भेज बुलाया। लेकिन वह हाजिर नहीं हुआ। अदालत ने 44 दिन में किशोरी के वाद पर एक तरफा फैसला देते बाल विवाह को शून्य करार दे दिया।

समिति करेगी संरक्षण, फिर जहां पसंद उसकी मर्जी
किशोरी के बालिग होने तक समिति ही उसकी संरक्षक होगी। बालिग होने के बाद किशोरी जहां चाहे शादी कर सकती है। अदालत के निर्णय के बाद यह उसकी पहली शादी कहलाएगी।

Published on:
30 Jan 2019 11:27 pm