भीषण गर्मी में बच्चों का स्वास्थ्य होगा जोखिम में, स्कूलों में न कूलर-पंखे, न ठंडे पानी की व्यवस्था
राजस्थान के विद्यालयों में 1 अप्रेल से नया शैक्षिक सत्र शुरू करने का फरमान प्रशासनिक चश्मे से भले ही सही नजर आ रहा हो, लेकिन प्रदेश और विशेषकर भीलवाड़ा व आसपास के जिलों की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के लिहाज से यह फैसला पूरी तरह अव्यावहारिक साबित हो सकता है। अप्रेल शुरू होते ही राजस्थान में सूरज आग उगलने लगता है और मई-जून तक तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच जाता है। ऐसे में बिना पर्याप्त संसाधनों के नौनिहालों को स्कूल बुलाना उनके स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है।
इस फरमान को लेकर शिक्षकों और अभिभावकों में गहरी चिंता है। राजस्थान शिक्षक संघ (प्रगतिशील) ने इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया है कि यह फैसला कागजों पर तो बहुत अच्छा लग रहा है, लेकिन धरातल पर इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
भीषण गर्मी में छोटे बच्चों के लिए स्कूल आना-जाना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। बच्चों में लू हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन का खतरा काफी बढ़ जाएगा। गर्मी के खौफ से अधिकांश अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से कतराएंगे। इससे नए सत्र की शुरुआत में ही उपस्थिति का ग्राफ धड़ाम से गिर जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह स्थिति और भी भयावह होगी। जब बच्चे ही स्कूल नहीं आएंगे, तो सत्र की शुरुआत ही कमजोर हो जाएगी।
सरकार और शिक्षा विभाग को सुझाव दिया है कि या तो प्रदेश की गर्म जलवायु को देखते हुए सत्र की शुरुआत को मौसम के अनुसार समायोजित किया जाए, या फिर 1 अप्रेल से स्कूल खोलने से पहले सभी विद्यालयों में गर्मी से बचाव कूलर, पंखे, निर्बाध बिजली और ठंडा पानी की पर्याप्त और पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
नीरज शर्मा, प्रदेशाध्यक्ष, राजस्थान शिक्षक संघ (प्रगतिशील)