भीलवाड़ा

पेटीएम पेमेंट्स बैंक का लाइसेंस रद्द, एआईबीईए की मांग सभी निजी बैंकों का हो राष्ट्रीयकरण

14,500 कर्मचारियों और 9.5 करोड़ ग्राहकों का भविष्य अधर में; पेमेंट बैंक मॉडल की व्यवहार्यता पर उठे गंभीर सवाल

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Apr 26, 2026
पेटीएम पेमेंट्स बैंक का लाइसेंस रद्द, एआईबीईए की मांग सभी निजी बैंकों का हो राष्ट्रीयकरण

भीलवाड़ा. भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से 24 अप्रेल को पेटीएम पेमेंट्स बैंक लिमिटेड का बैंकिंग लाइसेंस रद्द किए जाने के बाद ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉयज एसोसिएशन (एआईबीईए) ने इस कार्रवाई और पूरी बैंकिंग व्यवस्था को लेकर चिंताएं व्यक्त की हैं। एआईबीईए के महासचिव सीएच वेंकटाचलम ने कहा है कि यह सिर्फ एक संस्था का बंद होना नहीं है, बल्कि यह पेमेंट बैंक मॉडल की दीर्घकालिक व्यवहार्यता पर बड़े सवाल उठाता है। संगठन ने देश में जनधन की सुरक्षा के लिए सभी निजी क्षेत्र के बैंकों के राष्ट्रीयकरण की पुरजोर मांग की है। आरबीआई की सख्त कार्रवाई के मुख्य कारण लगातार गैर-अनुपालन और नियामक घर्षण के कारण यह सख्त कदम उठाना पड़ा है। आरबीआई ने बैंक के कामकाज में मौजूद गंभीर चिंताओं को बार-बार रेखांकित किया था। केंद्रीय बैंक के अनुसार बैंक का कामकाज जमाकर्ताओं और जनहित के लिए हानिकारक तरीके से संचालित किया जा रहा था। बैंक प्रबंधन का सामान्य चरित्र भी जमाकर्ताओं और सार्वजनिक हित के प्रतिकूल पाया गया। आरबीआई ने स्पष्ट किया कि बैंक को आगे जारी रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य या जनहित पूरा नहीं होगा। इससे पूर्व, मार्च 2022 में अनुपालन प्रक्रियाओं (विशेषकर केवाईसी) में कमियों के चलते नए ग्राहकों को जोड़ने पर रोक लगाई गई थी। इसके बाद मार्च 2024 में नए डिपॉजिट, क्रेडिट लेनदेन और वॉलेट या फास्टैग में टॉप-अप पर भी सख्त प्रतिबंध लगा दिए गए थे।

रोजगार और आम जनता पर पड़ेगा भारी असर

पेटीएम पेमेंट्स बैंक के इस पतन का सबसे बड़ा खामियाजा इसके कर्मचारियों और आम ग्राहकों को भुगतना पड़ रहा है। बैंक की वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक संस्था से 14 हजार 500 से अधिक कर्मचारी और लगभग 66 हजार बिजनेस कॉरेस्पोंडेंटजुड़े हुए थे। इनका भविष्य अब पूरी तरह अनिश्चित है। लगभग 9.5 करोड़ ग्राहकों का विशाल आधार इस संकट से सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है। 540 जिलों के करीब 15 हजार गांवों में 66 हजार बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट्स अंतिम छोर तक बुनियादी बैंकिंग सेवाएं पहुंचा रहे थे। ग्रामीण और बैंकिंग सेवाओं से वंचित क्षेत्रों के इन ग्राहकों के सामने अब दैनिक आर्थिक लेन-देन का भारी संकट खड़ा हो गया है।

पेमेंट बैंक का बिजनेस मॉडल ही है दोषपूर्ण

एआईबीईए ने कहा कि पेटीएम पेमेंट्स बैंक की विफलता पेमेंट बैंक बिजनेस मॉडल के अंत की शुरुआत है। वर्ष 2013 में नचिकेत मोर समिति की सिफारिशों के आधार पर कम आय वाले परिवारों और छोटे व्यवसायों की मदद के नाम पर इस मॉडल को मंजूरी दी गई थी। आरबीआई ने कुल 11 पेमेंट बैंकों को मंजूरी दी थी, लेकिन इनमें से कुछ ही शुरू हो पाए। आदित्य बिड़ला पेमेंट बैंक को अव्यवहार्यता के कारण 2019 में ही बंद करना पड़ा था। चोला मंडलम, टेक महिंद्रा और सन फार्मा ने मंजूरी मिलने के बाद भी बिजनेस की अव्यवहार्यता का हवाला देते हुए अपने लाइसेंस सरेंडर कर दिए। वोडाफोन एम-पैसा ने भी अपना लाइसेंस वापस कर दिया था। एयरटेल पेमेंट्स बैंक पर साल 2018 में ग्राहकों की बिना सहमति के खाते खोलने पर 5 करोड़ रुपए का भारी जुर्माना लग चुका है। वहीं, जियो पेमेंट बैंक का लाइसेंस सक्रिय होने के बावजूद वह कार्यात्मक नहीं है। ऐसे में यह एक ढांचागत चिंता का विषय है कि जिस मॉडल में ऋण देने जैसी मुख्य राजस्व पैदा करने वाली गतिविधियों पर ही पाबंदी हो, वह एक प्रतिस्पर्धी बैंकिंग प्रणाली में कैसे टिका रह सकता है।

जनता की गाढ़ी कमाई बचाने के लिए निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण जरूरी

आईबीईए ने स्पष्ट किया है कि बैंक जनता की भारी बचत राशि के कस्टोडियन हैं और इसे सुरक्षित रखना सर्वोपरि है। वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक सहित सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास लगभग 140 लाख करोड़ रुपए की जनता की गाढ़ी कमाई जमा है।वहीं, मौजूदा निजी बैंक भी जनता के करीब 85 लाख करोड़ रुपए संभाल रहे हैं। बैंकिंग सेक्टर में जो भारी फंसा हुआ कर्ज है, वह मुख्य रूप से निजी कॉर्पोरेट और व्यापारिक घरानों की ओर से ऋण न चुकाने के कारण पैदा हुआ है। पूर्व में भी कई निजी बैंकों को संकट के चलते मोरेटोरियम पर रखकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में मिलाना पड़ा है। इसलिए, जनता की बहुमूल्य बचत को पूरी तरह सुरक्षित रखने का सबसे बेहतर और एकमात्र समाधान यही है कि देश के सभी निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के अधीन लाया जाए।

Published on:
26 Apr 2026 08:22 pm
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