
राजस्थान में पिछले 2 महीनों के भीतर सरकारी अस्पतालों में प्रसव के दौरान और ऑपरेशन के बाद होने वाली गर्भवती महिलाओं की मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे पूरे प्रदेश में चिंता और आक्रोश का माहौल है। इस गंभीर स्वास्थ्य संकट के बीच, राजस्थान सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर एक के बाद एक नए विवादों में फंसने की वजह से चर्चा में हैं। अब एक ताज़ा विवाद उनके भीलवाड़ा स्थित सरकारी अस्पताल के दौरे का है, जहां निरीक्षण के लिए पहुंचे स्वास्थ्य मंत्री का स्वागत पुलिस कर्मियों द्वारा 'गार्ड ऑफ ऑनर' देकर किया गया।
भीलवाड़ा के जिस अस्पताल में हाल ही में 5 गर्भवती महिलाओं की दर्दनाक मौत हुई थी, वहां एक तरफ जहां पीड़ित परिवार अपनी माताओं और बहनों को खोने के गम में डूबे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ अस्पताल परिसर में मंत्री को दिए गए इस वीआईपी ट्रीटमेंट और सलामी ने जनता के गुस्से को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।
भीलवाड़ा जिला अस्पताल में पिछले कुछ दिनों में प्रसव के बाद अचानक बिगड़ी तबीयत के कारण 5 महिलाओं की मौत हो चुकी है। इस त्रासदी के बाद जमीनी हालात का जायजा लेने और प्रशासनिक लापरवाही की जांच करने के लिए स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर अस्पताल पहुंचे थे। लेकिन जैसे ही वे अस्पताल की दहलीज पर पहुंचे, स्थानीय प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय उनके स्वागत में पुलिस की टुकड़ी तैनात कर दी और उन्हें औपचारिक सलामी यानी 'गार्ड ऑफ ऑनर' दिया गया।
अस्पताल के भीतर जहां मरीजों के परिजन बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षित इलाज के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहां इस तरह के प्रोटोकॉल का पालन किए जाने पर स्थानीय लोगों और नागरिक समाज ने भारी नाराजगी व्यक्त की है।
मंत्री के स्वागत की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों ने सवाल उठाए कि जब अस्पतालों में मौत का मातम पसरा हो, तो मंत्रियों को इस तरह के प्रोटोकॉल और औपचारिक स्वागत से खुद को दूर रखना चाहिए था।
ये पहली बार नहीं है जब प्रसूताओं के मौत मामले पर मंत्री गजेंद्र सिंह विवादों में रहे हों। इससे पहले वे
पत्रकारों के सवालों को मुस्कुराते हुए "मिलेंगे ब्रेक के बाद" कहकर टालते हुए नज़र आ चुके हैं। वहीं इससे भी पहले वे एक विवादित बयान पर सुर्ख़ियों में आ गए थे, जब उन्होंने प्रसूतावा के सरकारी अस्पताल पहुँचने को "नाचते-गाते'' शब्दों से संबोधित किया था।
राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में हो रही यह मौतें किसी एक जिले तक सीमित नहीं हैं। पिछले 2 महीनों (मई 2026 से अब तक) में राज्य के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में प्रसव के दौरान या ऑपरेशन के बाद कम से कम 18 गर्भवती महिलाओं की जान जा चुकी है।
मौतों का यह सिलसिला कोटा, जोधपुर, बीकानेर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा सहित कई जिलों में देखने को मिला है। डॉक्टरों और जांच रिपोर्टों के अनुसार, जिन महिलाओं की मौत हुई या जिनकी हालत बेहद नाजुक हुई, उनमें प्रसव के तुरंत बाद किडनी फेल होना और आंखों की रोशनी चले जाना जैसे बेहद गंभीर लक्षण देखे गए।
शुरुआती आशंकाओं में यह बात सामने आ रही है कि सरकारी सप्लाई में बांटी जा रही कुछ जीवन रक्षक दवाएं या एनेस्थीसिया के इंजेक्शन मानक स्तर के नहीं थे, जिसके कारण महिलाओं के अंगों पर इसका जानलेवा असर हुआ।
इस मानवीय संकट और स्वास्थ्य मंत्री के 'गार्ड ऑफ ऑनर' विवाद को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने राज्य की भजनलाल शर्मा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने इस घटना को सरकारी लापरवाही और तंत्र की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा सबूत बताया है।
बढ़ते बवाल और चौतरफा घिरने के बाद आखिरकार राजस्थान स्वास्थ्य विभाग भी हरकत में आया है। डैमेज कंट्रोल के तहत सरकार ने आपातकालीन समीक्षा बैठक बुलाई और इस संकट से निपटने के लिए कई कड़े कदम उठाने के आदेश जारी किए हैं।
हाई-लेवल इंक्वायरी: मौतों के सटीक कारणों का पता लगाने के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया गया है।
AIIMS दिल्ली की मदद: राजस्थान के विशेषज्ञ डॉक्टर इस गंभीर संकट को समझने और इसके कारणों का विश्लेषण करने के लिए दिल्ली स्थित एम्स के वरिष्ठ डॉक्टरों से लगातार संपर्क और परामर्श कर रहे हैं।
5 दिवसीय राज्यव्यापी स्क्रीनिंग: राज्य सरकार ने सरकारी अस्पतालों में भर्ती सभी गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की गहन जांच के लिए 5 दिन का विशेष स्क्रीनिंग अभियान शुरू किया है ताकि किसी भी तरह के खतरे को समय रहते टाला जा सके।