
Gajendra Singh Khinvsar Controversial statement
राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की हो रही मौतों का गंभीर और संवेदनशील मामला पूरे प्रदेश में गरमाया हुआ है। इस मानवीय संकट को लेकर स्वास्थ्य भवन में आयोजित एक महत्वपूर्ण उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक के बाद जब मीडियाकर्मियों ने राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर से प्रसूताओं की सुरक्षा और सरकार की जवाबदेही को लेकर तीखे सवाल पूछे, तो मंत्री जी ने कोई ठोस जवाब देने के बजाय मुस्कुराते हुए कैमरे के सामने कह दिया- "मिलते हैं ब्रेक के बाद", और इसके तुरंत बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़कर आगे बढ़ गए।
ध्यान दिला दें कि राज्य में पिछले ढाई महीनों के भीतर सरकारी अस्पतालों के लेबर रूम में 18 से अधिक प्रसूताओं की जान जा चुकी है। यही वजह है कि ऐसे संवेदनशील समय में स्वास्थ्य मंत्री की इस असहज करने वाली हंसी और लापरवाही भरे लहजे ने राजस्थान की जनता और विपक्ष को पूरी तरह आक्रोशित कर दिया है।
मंत्री के हंसकर दिए जवाब का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विपक्ष ने इसे राजस्थान के पूरे सरकारी चिकित्सा तंत्र की घोर विफलता बताते हुए मंत्री के इस्तीफे की मांग एक बार फिर तेज कर दी है।
स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के 'कैजुअल' और असंवेदनशील रवैये को लेकर राजस्थान की सियासत पूरी तरह गर्मा गई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जहां एक तरफ मरुधरा में मासूम महिलाओं और नवजातों की माताओं की लगातार लाशें उठ रही हैं, वहीं राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मीडिया के सवालों पर हंसकर 'ब्रेक' की बातें कर रहे हैं।
विपक्ष ने मांग की है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए लापरवाह अधिकारियों को निलंबित करना चाहिए और स्वास्थ्य मंत्री से इस असंवेदनशील टिप्पणी के लिए जनता से सार्वजनिक माफी मंगवानी चाहिए।
सरकारी अस्पतालों में प्रसव के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों और रिपोर्ट के अनुसार, पिछले ढाई महीनों यानी मई 2026 से लेकर अब तक राजस्थान के विभिन्न जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में डिलीवरी के बाद 18 महिलाओं की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि 50 से अधिक महिलाएं गंभीर रूप से बीमार हुई हैं।
सबसे भयावह स्थिति तब सामने आई जब महज 6 दिनों के भीतर (5 से 10 जुलाई के बीच) भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जिलों में कुल 9 प्रसूताओं की जान चली गई।
शुरुआती जांचों में सामने आया है कि प्रसव कक्ष और ऑपरेशन थिएटर (OT) में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के चलते खतरनाक बैक्टीरिया इन्फेक्शन फैला, जिससे डिलीवरी के बाद महिलाओं के शरीर के प्रमुख अंगों ने काम करना बंद कर दिया।
राजस्थान के अलग-अलग जिलों से आए डरावने आंकड़े बताते हैं कि सरकारी दावों के विपरीत धरातल पर स्वास्थ्य सेवाएं कितनी बदहाल हैं:
भीलवाड़ा : यहां महज 6 दिनों के भीतर सिजेरियन डिलीवरी के बाद 5 प्रसूताओं की असमय मौत हो गई, जिसके बाद पूरे जिले में भारी आक्रोश फैल गया।
बांसवाड़ा: वागड़ अंचल के इस आदिवासी बहुल जिले में हाल ही में 4 गर्भवती महिलाओं की मौत हुई, जिनमें एक नाबालिग प्रसूता भी शामिल थी।
कोटा: हाड़ौती संभाग के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में मई महीने के दौरान प्रसव के बाद 5 महिलाओं की मौत किडनी फेल होने की वजह से हुई थी।
बीकानेर : जून महीने में सिजेरियन ऑपरेशन के बाद कई महिलाओं की तबीयत अचानक बिगड़ी, जिनमें से 2 महिलाओं की मौत हो चुकी है, जबकि 7 महिलाएं अब भी गंभीर स्थिति में किडनी फेल होने के बाद डायलिसिस पर जिंदगी की जंग लड़ रही हैं।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक पेंच तब फंसा जब स्वास्थ्य मंत्री ने सीधे तौर पर किसी भी प्रकार की मेडिकल लापरवाही से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने दलील दी कि प्रसूताओं की मौत एनीमिया, हाई ब्लड प्रेशर, पीपीएच (मल्टीपल कॉम्प्लिकेशंस) और अंतिम समय में निजी नर्सिंग होम से रेफर होकर सरकारी अस्पतालों में आने के कारण हुई है।
हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भीलवाड़ा अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में जिस स्यूडोमोनास बैक्टीरिया के इन्फेक्शन की पुष्टि हुई है, वह सीधे तौर पर अस्पताल प्रशासन द्वारा स्टरलाइजेशन के नियमों में की गई घोर लापरवाही को दर्शाता है।
प्रसूताओं की मौतों को लेकर मचे भारी बवाल और चौतरफा दबाव के बाद राजस्थान सरकार ने डैमेज कंट्रोल की प्रक्रिया शुरू की है:
विशेष संयुक्त कमेटी का गठन: मामले की निष्पक्ष और गहन जांच के लिए एसएमएस मेडिकल कॉलेज जयपुर, एम्स जोधपुर और बीकानेर के विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक संयुक्त विशेष कमेटी बनाई गई है, जो सभी मौतों की विस्तृत क्लीनिकल ऑडिट कर रही है।
ऑपरेशन थिएटर सील: भीलवाड़ा अस्पताल के जिस ओटी (OT) में घातक बैक्टीरिया का संक्रमण मिला था, उसे तुरंत प्रभाव से सील कर बंद कर दिया गया है। इसके अलावा सभी अस्पतालों से प्रसव के दौरान दी गई दवाओं और ऑक्सीटोसिन इंजेक्शनों के सैंपल लेकर जांच लैब में भेजे गए हैं।
स्टाफ पर गाज: भीलवाड़ा मामले की शुरुआती जांच रिपोर्ट के बाद मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम के प्रभारियों, स्थानीय डॉक्टरों और ड्यूटी नर्सिंग स्टाफ के खिलाफ निलंबन और तबादले की कार्रवाई शुरू की गई है।
Updated on:
14 Jul 2026 12:06 pm
Published on:
14 Jul 2026 12:06 pm
