
Rajasthan Health Minister Gajendra Singh Khinvsar
राजस्थान के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में हाल ही के दिनों में प्रसूताओं की एक के बाद एक हुई मौतों के मामले ने राज्य सरकार और चिकित्सा विभाग की चिंताएं पूरी तरह बढ़ा दी हैं। इस संवेदनशील और गंभीर मुद्दे को लेकर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने सोमवार को जयपुर स्थित स्वास्थ्य भवन में प्रदेश के शीर्ष गायनोलॉजिस्ट विशेषज्ञों के साथ एक हाई-लेवल समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। बैठक के दौरान राज्य सरकार की दलीलें सामने रखते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि कोटा, बीकानेर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जैसे जिलों में प्रसूताओं की असमय मृत्यु के पीछे मुख्य रूप से एनीमिया (खून की कमी), हाई ब्लड प्रेशर, पीपीएच (प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव) और पोषण की भारी कमी जैसे गंभीर कारण जिम्मेदार रहे हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ये सभी महिलाएं सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे अस्पतालों से गंभीर हालत में बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेजों में रेफर होकर आई थीं, जहां डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद इन्हें नहीं बचाया जा सका। सरकार इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गंभीर है और जमीनी स्तर पर मातृ स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए युद्ध स्तर पर काम कर रही है ताकि ग्रामीण अंचलों में किसी भी मां को प्रसव के दौरान अपनी जान न गंवानी पड़े।
स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने बैठक में पिछले कुछ वर्षों के आधिकारिक आंकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि राजस्थान में मातृ मृत्यु दर में लगातार गिरावट आ रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार:
वर्ष 2023-24 में राज्य के भीतर कुल 1094 प्रसूताओं की मृत्यु दर्ज की गई थी।
वर्ष 2024-25 में यह संख्या घटकर 986 तक पहुंच गई।
वर्ष 2025-26 के चालू आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार यह संख्या और अधिक कम होकर 824 रह गई है।
इस प्रकार वर्तमान सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्य में मातृ मृत्यु के मामलों में लगभग 25 प्रतिशत की एक बड़ी और सकारात्मक कमी दर्ज की गई है। हालांकि, मंत्री ने माना कि हाल ही में कम समय अंतराल के भीतर हुई मौतें चिंताजनक हैं और विभाग इसके प्रति पूरी तरह जवाबदेह है।
चिकित्सा मंत्री ने अतीत के कुछ बड़े चिकित्सा हादसों का भी संदर्भ दिया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 में जोधपुर के उम्मेद अस्पताल में मात्र 3 दिन के भीतर 18 प्रसूताओं की मौत हो गई थी, जिसका मुख्य कारण एक दूषित इंफेक्शन या तकनीकी लापरवाही थी।
इसी प्रकार वर्ष 2011-12 में जयपुर में भी 8 प्रसूताओं की एक के बाद एक मौत हुई थी, जिनका कारण एक समान था। लेकिन वर्तमान में कोटा, बीकानेर या भीलवाड़ा में हुई घटनाओं का कोई एक समान पैटर्न या कारण नहीं है।
ये सभी प्रसूताएं पहले से ही 'हाई रिस्क' श्रेणी की थीं। किसी को अत्यधिक एनीमिया था तो किसी का हाई बीपी के कारण लीवर और किडनी फेलियर जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई थी।
स्वास्थ्य मंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बांसवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल और भीलवाड़ा, कोटा तथा बीकानेर के मेडिकल कॉलेज प्राचार्यों व अधीक्षकों से सीधे संवाद किया। उन्होंने हाल ही में दम तोड़ने वाली प्रसूताओं के एक-एक केस की विस्तृत केस हिस्ट्री और ऑडिट रिपोर्ट पर डॉक्टरों से जवाब-तलब किया।
खींवसर ने डॉक्टरों को सख्त निर्देश दिए कि अस्पतालों के भीतर किसी भी प्रकार का इंफेक्शन न फैले, इसे पहले से ही सुनिश्चित किया जाए और इलाज के दौरान तय क्लीनिकल प्रोटोकॉल का शत-प्रतिशत पालन अनिवार्य रूप से किया जाए।
प्रशासनिक सुधारों की बात करते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने बड़े मेडिकल कॉलेजों के वरिष्ठ डॉक्टरों को निर्देश दिए कि वे अपने नीचे आने वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) के डॉक्टरों के लिए एक मेंटर की तरह काम करें। जब निचले स्तर पर ही हाई रिस्क प्रेगनेंसी की पहचान हो जाएगी, तो बड़े अस्पतालों पर मरीजों का दबाव कम होगा।
स्वास्थ्य मंत्री ने वरिष्ठ गायनोलॉजिस्ट्स को खुद फील्ड में जाकर ग्रामीण इलाकों में कार्यरत आशा सहयोगिनियों और एएनएम द्वारा की जाने वाली प्रसव पूर्व जांच (ANC) की प्रभावी मॉनिटरिंग करने के आदेश दिए गए हैं।
इस महत्वपूर्ण बैठक में उपस्थित प्रदेश के निजी और सरकारी क्षेत्र के गायनोलॉजिस्ट विशेषज्ञों ने राज्य सरकार को कई महत्वपूर्ण तकनीकी सुझाव दिए, जिन पर जल्द ही अमल किया जाएगा
विशेष आईसीयू की स्थापना: गंभीर प्रसूताओं के इलाज के लिए बड़े अस्पतालों में अलग से एक 'ऑब्सटेट्रिक आईसीयू' स्थापित किया जाना चाहिए।
लेबर रूम का सुदृढ़ीकरण: अस्पतालों के लेबर रूम में ओवर क्राउडिंग यानी अत्यधिक भीड़ को नियंत्रित किया जाए।
प्राइमरी लेवल पर इलाज: प्राथमिक स्तर पर ही गर्भवती महिलाओं के गंभीर एनीमिया (खून की कमी) का इलाज शुरू हो और ऑपरेशन से पूर्व ईसीजी (ECG) जैसी आवश्यक जांचें अनिवार्य की जाएं।
रेफरल आउट रजिस्टर: प्रत्येक अस्पताल में एक 'रेफरल आउट रजिस्टर' मेंटेन हो, ताकि पता चल सके कि किस मरीज को किस हालत में आगे भेजा गया है।
इस महत्वपूर्ण बैठक में प्रमुख शासन सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य गायत्री राठौड़, मिशन निदेशक एनएचएम डॉ. जोगाराम, आयुक्त चिकित्सा शिक्षा बाबूलाल गोयल सहित प्रदेश के सभी प्रमुख मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्य और पीएमओ उपस्थित रहे।
Updated on:
14 Jul 2026 09:36 am
Published on:
14 Jul 2026 09:36 am
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