विक्रम संवत 1915 में प्रथम स्वतंत्रता क्रांति के वीर तात्या टोपे ने अधरशिला पहाडिय़ों मे पड़ाव डाला
भीलवाड़ा ।
उपनगर पुर के प्रसिद्ध अधरशिला महादेव स्थल का जिले ही नहीं अपितु प्रदेश में विशिष्ट स्थान है। यहां विक्रम संवत 1915 में प्रथम स्वतंत्रता क्रांति के वीर तात्या टोपे ने अधरशिला पहाडिय़ों मे पड़ाव डाला और तत्कालीन पुजारी आयस नाथ से मदद ली थी। तांत्या टोपे रात में ही महादेवजी की पूजा अर्चना करते थे। कुछ दिन बाद सलूंबर की और प्रस्थान किया। यहां अभी गत 33 वर्ष से सेवक शभूनाथ योगी सेवा पूजा कर रहे है। इस स्थल की महिमा दिनों दिन बढ़ती जा रही है। नगर परिषद के साथ ही नगर विकास न्यास ने यहां विकास कार्य करवाए है।
सावन में पिकनिक स्पॉट में तब्दील हो जाता है अधरशिला
यहां श्रावण माह मे श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। बारिश के मौसम में तो ये स्थल पिकनिक स्पॉट में तब्दील रहता है। मान्यता है कि यहां आने वाले लोगों का दुख दर्द दूर हो जाता है। यहां भगवान महादेव की पूजा व अभिषेक कर सुख समृृृद्धि की कामना की जाती है। जिला मुख्यालय से दस किलोमीटर व पुर से दो किलोमीटर दूर ढलान पर मगरमच्छ की आकृति की चट्टान है। यहां के बड़े बुजुर्ग बताते है कि जिस चट्टान को अधरशिला कहा जाता है, उसके नीचे गुप्त मौर्य काल की औंकारेश्वर महादेव की प्रतिमा स्थित हैै।
1967 तक थे शेर चीते
इस चट्टान के नीचे महादेव की प्रतिमा होने से ये क्षेत्र अधरशिला महादेव के नाम से जाना जाता है। मंदिर के पश्चिम दिशा मे कच्ची गुफा है। जिसमें वर्ष 1967 तक दिन में ही शेर-चीते बाहर निकल आते थे, जानकार बताते है कि यहां से चीते को कैद कर जंतुआलय भी भेजा गया था। गुफा के ऊपर कुंड को मोर कुंड के नाम से जाना जाता है।