रथ को मोड़कर, कंगन को तोड़कर, तुम तो चले, मैं कहां जाऊंगी…’ जैसे ही यह मार्मिक भक्ति गीत गूंजा, पूरा पांडाल भाव-विभोर हो उठा। संगीतकार की मधुर स्वर लहरियों के बीच जब 22वें तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ (नेमीकुमार) की बारात और उनके वैराग्य का दृश्य साकार हुआ, तो वहां मौजूद हर श्रद्धालु की आंखें नम हो […]
रथ को मोड़कर, कंगन को तोड़कर, तुम तो चले, मैं कहां जाऊंगी…' जैसे ही यह मार्मिक भक्ति गीत गूंजा, पूरा पांडाल भाव-विभोर हो उठा। संगीतकार की मधुर स्वर लहरियों के बीच जब 22वें तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ (नेमीकुमार) की बारात और उनके वैराग्य का दृश्य साकार हुआ, तो वहां मौजूद हर श्रद्धालु की आंखें नम हो गईं। अवसर था आरके कॉलोनी स्थित आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में चल रहे श्रीसिद्ध चक्र मण्डल विधान पूजन का। इस दौरान सुभाष एवं मीना हुमड़ ने भगवान नेमीनाथ के वैराग्य का इतना सजीव और मार्मिक चित्रण किया कि उपस्थित समाजजन भक्ति और वैराग्य रस में डूब गए।
महायज्ञनायक महेन्द्र सेठी ने बताया कि विधान के तहत गुरुवार को पंडित जयकुमार जैन के निर्देशन में छठे वलय की पूजा संपन्न हुई। इस विशेष अनुष्ठान में श्रावक-श्राविकाओं ने दर्शनावरणीय, ज्ञानावरणीय, अन्तराय एवं नामकर्म सहित 146 कर्मभेदों के नाश और सिद्धत्व स्वरूप को प्राप्त करने की भावना भाई। इसके साथ ही, लोकाग्रस्थित सिद्धपरमेष्ठी की पूजा-अर्चना करते हुए भगवान को 256 अर्घ्य अर्पित किए गए।
विधान के दौरान पंडित जयकुमार जैन ने जब आठवें नंदीश्वर द्वीप के 52 जिन चैत्यालयों में विराजित जिनप्रतिमाओं का ध्यान कराया और श्रद्धालुओं को भावपूर्वक दर्शन कराए, तो सम्पूर्ण वातावरण परम शांति और प्रभुभक्ति में लीन हो गया। पंडित जैन ने कहा कि प्रभु की सच्ची भक्ति में इतनी शक्ति है कि वह पाप को पुण्य में परिवर्तित कर देती है। इसके प्रभाव से शत्रु भी मित्र के समान बन जाते हैं और भयंकर से भयंकर रोगों का भी क्षय हो जाता है।
विधान के प्रारम्भ में भगवान आदिनाथ पर प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य महावीर, सरिता एवं सौरभ झांझरी परिवार को मिला। इस दौरान प्रभु का अभिषेक और दर्शन करने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। सम्पूर्ण मंदिर परिसर 'जय जिनेन्द्र' और भजनों की गूंज से चैतन्यमय रहा।