सरकारी स्कूलों के बच्चों को हाईटेक और एआई आधारित शिक्षा से जोड़ने का सरकारी सपना सिस्टम की नकारा कार्यप्रणाली की भेंट चढ़ गया है। सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए खर्च कर तैयार की गई आईसीटी (इंफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी) लैब आज कबाड़ में तब्दील हो चुकी हैं। भीलवाड़ा जिले की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है, […]
सरकारी स्कूलों के बच्चों को हाईटेक और एआई आधारित शिक्षा से जोड़ने का सरकारी सपना सिस्टम की नकारा कार्यप्रणाली की भेंट चढ़ गया है। सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए खर्च कर तैयार की गई आईसीटी (इंफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी) लैब आज कबाड़ में तब्दील हो चुकी हैं। भीलवाड़ा जिले की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है, यहां 500 से अधिक स्कूलों में लैब होने के बावजूद बच्चे माउस और की-बोर्ड छूने को तरस रहे हैं। बच्चों को तकनीक से जोड़ने के लिए पूर्व कलक्टर ने जो करोड़ों का बजट डीएमएफटी से स्वीकृत किया था, उसे मौजूदा प्रशासन ने निरस्त कर दिया।
जिले के 514 स्कूलों में आईसीटी लैब स्थापित की गई थीं। इनमें 508 सीनियर हायर सैकंडरी और 6 उच्च प्राथमिक विद्यालय शामिल हैं। प्रत्येक लैब में 10 से 14 कंप्यूटर उपकरण लगाए गए थे, लेकिन आरोप है कि पुराने सॉफ्टवेयर के चलते ये उपकरण चालू होने के कुछ माह बाद जवाब दे गए।
सिस्टम की मनमानी का सबसे बड़ा उदाहरण डीएमएफटी के बजट में देखने को मिला। पूर्व जिला कलक्टर नमित मेहता ने जिले के छात्रों को हाईटेक शिक्षा देने की पहल की थी। उन्होंने 204 स्कूलों को स्मार्ट बनाने के लिए 2.65 करोड़ और 301 स्कूलों में आईसीटी लैब के लिए 19.26 करोड़ रुपए का बजट डीएमएफटी से जारी किया था। टेंडर प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी। लेकिन वर्तमान जिला कलक्टर जसमित सिंह संधू ने इस आदेश को निरस्त कर दिया है।
कलक्टर का तर्क है कि कई स्कूल भवन जर्जर अवस्था में हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि जिन विद्यालयों के पास अपना बजट है, वे अपने स्तर पर स्मार्ट क्लास और आईसीटी पर काम करें। प्रशासन के इस फैसले को शिक्षाविद बच्चों के भविष्य में 'रोड़ा' मान रहे हैं।
डिजिटल साक्षरता की पोल स्मार्ट क्लास रूम के आंकड़े भी खोल रहे हैं। जिले के 555 स्कूलों में स्मार्ट क्लास रूम बनाए गए थे। इनमें से 294 स्कूलों के सिस्टम पूरी तरह ठप पड़े हैं। हालत यह है कि राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद ने इन 294 स्कूलों के उपकरणों को नकारा घोषित कर दिया है।
सरकार की मंशा हर छात्र को नई टेक्नोलॉजी और एआई के साथ आगे बढ़ाने की है, लेकिन अफसरशाही के फैसले इसमें बाधा बन रहे हैं। बजट निरस्त करना समस्या का हल नहीं है, यह सीधे तौर पर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों के शैक्षिक भविष्य पर कुठाराघात है।