छोड़िया में पशु सीखते हैं सींग से मारकर आत्मरक्षा करना
तिलस्वां।
क्षेत्र में परंपरागत तरीके से आज भी पशुपालक अपने पशुओं को जंगल में हिंसक जानवरों से बचने के लिए छोडिया खेल खिलाया जाता है। इसके पशु हिंसक व खूंखार जानवरों से आत्मरक्षा के गुर सीखता है। इसमें भाग लेने के लिए जिलेभर से हजारों की संख्या में पशु पालक अपने पशुओं को लेकर पहुंचते हैं। वहीं इसे देखने के लिए ग्रामीणों का हुजूम जमा होता है।
जानकारी के अनुसार दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा पर मेला ग्राउंड पर लोग अपने सजे धजे पशुओं को लेकर छोडिया खेल खिलाने के लिए पहुंचते हैं। इसमें बारी—बारी से पशुओं को हिंसक जानवरों से आत्मरक्षा के लिए सींग मारना सिखाते हैं। जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में क्षेत्र सहित जिलेभर के लोग पहुंचते हैं और फिर शुरू होता है छोडिया।
क्या है छोडिया खेल
छोडिया मरे हुए जानवर की खाल को लकड़ी में बांधकर पशुओं को सुंघाया जाता है। पशु उसे सूंघकर खूंखार व जंगली जानवर समझ लकड़ी के पीछे मारने दौड़ता है। कई बार तो खेल खिलाने वाला व्यक्ति डंडे को छोड़कर भाग खड़ होता है। ग्रामीणों के अनुसार यह खेल पशुओं को आत्मरक्षा के लिए खिलाया जाता है । ताकि जंगल में हिंसक जानवरों से आत्मरक्षा कर सकें।
वर्षों से चली आ रही है पंरपरा
ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। ग्रामीण अपने पशुधन को बचाने के लिए इस पंरपरा का आज भी निर्वहन कर रहे हैं।
देखने वालों का लगता है मेला
इसके देखने के लिए मेला ग्राउंड पर चारों तरफ ग्रामीणों की भीड़ जमा हो जाती है। इसमें बुजुर्ग, महिलाएं व बच्चे भी शामिल होते हैं। खेल के दौरान देखने वाले तालियों के साथ हुटिंंग करते हैं।