बैंक व वित्तीय संस्थाओं की बकायादार बुनकर सहकारी समितियों को मिल सकती है कर्जमाफी की सौगात
भिण्ड. वस्त्र उद्योग में बढ़ते तकनीकि के उपयोग व हथकरघा उद्योग के प्रति शासन की लंबे समय तक रही बेरुखी से बंद हो चुके भिण्ड जिले के हथकरघा उद्योग को अब पुन: शुरू किया जाएगा। मप्र का हथकरघा एवं हस्तशिल्प महकमा इसकी तैयारियों में जुटा हुआ है। हथकरघा महकमा जिले की बंद हो चुकी बुनकर सहकारी समितियों व उनसे जुड़े बुनकर कारीगरों की जानकारी एकत्र करने में जुटा हुआ है। अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो जिले की 30 साल से बंद पड़े लगभग 20 से ’यादा हथकरघा उद्योगों के फिर से शुरू होने की संभावना है।
शासन जिले की लगभग डेढ़ दर्जन बकायादार बुनकर सहकारी समितियों को कर्ज माफी की सौगात भी दे सकती है। शहर के सुंदरपुरा बीटीआई रोड, पुरानी बस्ती व वनखंडेश्वर मार्ग नयापुरा इलाके तथा गोहद कस्बे के तकरीबन 21 हथकरघा उद्योग जो बुनकरों के सहकारी समूह चलाते थे, विगत तीन दशकों से बंद हैं। सैकड़ों परिवारों की आजीविका खत्म हो चुकी है।
भिण्ड में 1960 से 1990 के दशक तक हथकरघों की खट-खट की मधुर आवाज गंूजती थी। काटनजीन कालोनी में सूत की गठानों को रंगने का कारोबार होता था। पुराने बुजुर्ग बताते हंै कि हर एक घर में हथकरघे की बुनी हुई खोर (रजाई) उपयोग की जाती थी तथा किसान अपनी फसल व भूसा बैलगाड़ी पर लाने के लिए खेस (मोटा चादरा) का उपयोग करते थे। प्लास्टिक पॉलीथिन आने के बाद खेस का उपयोग बंद होता चला गया। गरीब मुस्लिम तथा अनुसूचित जाति समुदाय के तमाम परिवार इस धंधे से आजीविका चलाते थे जो अब बेरोजगारी झेल रहे हैं।
हथकरघा एवं हस्तशिल्प विभाग मप्र के आयुक्त राजीव शर्मा, जिनका भिण्ड गृह जिला भी है, ने जिले में दम तोड़ चुके इस कुटीर उद्योग को पुनजीर्वित करने में रुचि प्रदर्शित की है। उन्होंने हाल में विभाग के जिलाधिकारी से जिले के बुनकर कारीगरों, व बुनकर सहकारी संस्थाओं की जानकारी मांगी है। जिला हथकरघा व हस्तशिल्प अधिकारी एम जौहर कहते हैं, आयुक्त के निर्देश पर हमने सुंदरपुरा भिण्ड व गोहद कस्बे में एक-एक बुनकर सहकारी समिति के गठन का प्रस्ताव उपायुक्त सहकारिता को भेजा है। भिण्ड में एकीकृत क्लस्टर विकास कार्यक्रम योजना के तहत कौशल उन्नयन बुनाई प्रशिक्षण के लिए बुनकरों का चयन कर लिया है जिसके अन्तर्गत बुनकरों को उन्नत बुनाई का प्रशिक्षण दिया जाकर उन्हें बुनाई कार्य से जोड़ा जाएगा।
हथकरघा उत्पादों को सरकार का वैधानिक संरक्षण
हथकरघा उद्योग को संरक्षण देने के लिए भारत सरकार ने द हेण्डलूम्स (रिजर्वेशन आफ आर्टीकल्स फार प्रॉडकशन) एक्ट 1985 लागू किया हुआ है। इसमें सूती साडिय़ां, शतप्रतिशत सूत की धोतियंा, सूती तौलिया, गमछा, सोती धागे से बने अंग वस्त्र, लुंगी (तहमद), खेस, सूती बेडशीट, बेड कवर, दरी और फर्श, सूती धागों से निर्मित ड्रेस मटेरियल, कंबल तथा बैरक ब्लैंकेट, शॉल, लोई, मफ्लर, पाखी, कोट जैकेट और ड्रेस मटेरियल में इस्तेमाल हेाने वाले शतप्रतिशत ऊन से बने क्वीड आदि वस्त्र उत्पाद हथकरघा उद्योग के लिए आरक्षित किए गए हैं। इन उत्पादों को पावरलूमों से नहीं बनाया जा सकता।
भिण्ड में खुल सकता है मृगनयनी शोरूम
जिला हाथकरघा एवं हस्तशिल्प अधिकारी एम.जौहर के अनुसार उन्होंने जिले में पीतल की मूर्तियां व बर्तन ढालने वाले 9 हस्तशिल्पियों का भी चयन किया है, जिनके द्वारा बनाई गई प्रतिमाओं की मार्केटिंग हस्तशिल्प विकास निगम के मृगनयनी शोारूमों के माध्यम से देश भर में की जाएगी। भविष्य में भिण्ड में विभाग की मृगनयनी शोरूम खोलने की भी योजना है। मौजूदा में ये शेारूम ग्वालियर इंदौर जैसे बड़े शहरों में ही हैं। स्थानीय स्तरपर इस शोरूम के खुलने से जिले के हाथकरघा उत्पादों व हस्तशिल्पियों के उत्कृष्ट उत्पादों को बिक्री का एक नया प्लटफार्म मिलेगा।
-1960 से 1990 तक जिले मेंं हथकरघा उत्पादन जबरदस्त होता था। खेस व खोर महत्वपूर्ण उत्पाद थे। अब यह उद्योग बंद पड़ा है। विभाग बुनकरों के लिए जल्द ही कौशल उन्नन प्रशिक्षण शुरू करेगा तथा प्रशिक्षित बुनकरों को मप्र हस्तशिल्प विकास निगम से जोडक़र उनके उत्पादों के विपणन की व्यवस्था करेगा।
एम जौहर, जिला हाथकरघा एवं हस्तशिल्प अधिकारी भिण्ड।
-भिण्ड जिले का हथकरघा उद्योग बहुत समृृद्ध था, जो अब अंतिम सांसें गिन रहा है। इससे हथकरघा मजदूर व तमाम हस्तशिल्पी बेरोजगार हो गए हैं। भिण्ड जिले में हस्तशिल्पियों व हथकरघा मजदूरों को प्रोत्साहन देने के लिए विभाग द्वारा कार्य योजना तैयार की जा रही है।
राजीव शर्मा, आयुक्त हाथकरघा एवं हस्तशिल्प विभाग मप्र