- पहले कान सुन्न होता है, फिर दर्द होता है और उसके बाद सुनाई देना होता जाता है कम...।
भोपाल. बारिश के मौसम में मौसमी बीमारियों का खतरा बढ़ने लगता है। यही कारण है कि इन दिनों सरकारी अस्पतालों में खांसी, जुकाम व बुखार संबंधित परेशानियां ज्यादा देखने को मिलती हैं। जो सामान्य रूप से तीन से पांच में ठीक हो जाती हैं। लेकिन इस मौसम में आंखों और कानों से जुड़ी कुछ मौसमी बीमारी जीवन भर का खतरा पैदा कर सकती हैं। जिसमें इन दिनों मुख्य रूप से फंगल संक्रमण हैं। आंखों में होने पर यह देखने की क्षमता कम कर सकता है और कानों में होने पर सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। हमीदिया, एम्स और जेपी की इएनटी और नेत्र विभाग की ओपीडी में रोजाना ऐसे दर्जनों मरीज पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार समय से इलाज मिलने से इसे रोका जा सकता है।
इन दिनों उमस बढ़ी हुई है। इसी के कारण कान में फंगल संक्रमण (ओटोमाइकोसिस) की समस्या बढ़ रही है। हमीदिया अस्पताल के ईएनटी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. यशवीर जेके के अनुसार इस मौसम में यह बीमारी होती ही है। सही इलाज से यह जल्द ठीक हो जाती है। कुछ मामलों में गंभीरता के कारण अधिक समय भी लग सकता है। इस मौसम में कान में तेल नहीं डालना चाहिए। नमी अधिक होने से यह संक्रमण का कारण बन सकता है।
फंगल संक्रमण में पहले कान सुन्न होने जैसा महसूस होता है। इसके साथ दर्द भी रहता है। समय से इलाज ना होने से कान के पर्दे में छेद हो सकता है। जिससे सुनने की क्षमता प्रभावित होती है। इससे बचाव के लिए बारिश के दिनों में कान को सूखा रखें, दर्द में खुद से सफाई करने की गलती ना करें, बारिश में भीगने, एलर्जी और सर्दी से बचें।
हमीदिया अस्पताल के नेत्र रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ एसएस कुबरे बताते हैं कि इस मौसम में नमी ज्यादा होती है। ऐसे में आंखों में फंगस जमा हो जाता है। जैसे ही शरीर की इम्युनिटी कम होती है, फंगस सक्रिय हो जाता है। यह फंगस आंखों की पुतली पर असर करता है जिससे वह सफेद पड़ जाती है। इससे रोशनी कॉर्निया तक नहीं पहुंचती और दिखाई देना बंद हो जाता है। इसके अलावा आंखों में कचरे जैसी चुभन हो या आंखों में पानी आए तो डॉक्टर से मिलना चाहिए। अक्सर लोग मेडिकल या सामान्य चिकित्सकों से आई ड्रॉप ले लेते हैं। इनमें से कई आईड्रॉप में स्टेरॉयड होता है, जिससे इंफेक्शन बढ़ता है।
फंगल इंफेक्शन आमतौर पर किसानों या मिट्टी में काम करने वाले मजदूरों को होता है। इसके साथ ही बुजुर्ग, बच्चों, डायबिटिक, लंबे समय से बीमार लोगों को भी इसका खतरा बढ़ जाता है।