AIIMS Bhopal-ICMR Research: अध्ययन में 50 प्रतिशत मामलों में जीवित स्पर्म पाए गए। करीब 44 प्रतिशत में शुक्राणु सक्रिय और गतिशील थे।
AIIMS Bhopal-ICMR Research: मौत के साथ ही जीवन की सभी संभावनाएं खत्म हो जाती हैं, लेकिन नई स्टडी ने इस धारणा को चुनौती दी है। एम्स भोपाल और आइसीएमआर के शोध में सामने आया है कि फांसी की सजा या फांसी लगाने से हुई मौत के बाद भी पुरुष के शरीर में लगभग 21.5 घंटे तक शुक्राणु जीवित रह सकते हैं। यानी मौत के बाद भी व्यक्ति पिता बन सकता है।
फांसी से हुई मौतों पर आधारित इस रिसर्च को दुनिया का पहला कॉज-स्पेसिफिक ह्यूमन डेटा माना जा रहा है। ए्स भोपाल के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग द्वारा किए गए इस अध्ययन ने मौत के तुरंत बाद शुक्राणु नष्ट होने की धारणा को तोड़ा है। अध्ययन में पाया गया कि मृत्यु के लगभग एक दिन शुक्राणु जीवित रह सकते हैं। इससे आधुनिक प्रजनन तकनीकों के जरिए मृत व्यक्ति की संतान प्राप्ति संभव हो सकती है।
अध्ययन में 50 प्रतिशत मामलों में जीवित स्पर्म पाए गए। करीब 44 प्रतिशत में शुक्राणु सक्रिय और गतिशील थे। कुछ मामलों में शुक्राणुओं की जीवन क्षमता 72 प्रतिशत तक थी। यह आंकड़े बताते हैं कि मृत्यु के बाद भी प्रजनन कोशिकाएं अपेक्षा से कहीं अधिक समय तक सुरक्षित रह सकती हैं। एम्स ने वासो-एपिडिडाइमल वॉश नामक तकनीक विकसित की है, जिसके तहत पोस्टमार्टम के दौरान सुरक्षित तरीके से स्पर्म निकाले जाते हैं। उपयोग इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन जैसी आधुनिक सहायक में किया जा सकता है।
यह अध्ययन एम्स भोपाल के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. राघवेन्द्र कुमार विदुआ के नेतृत्व में किया गया। उन्होंने अब तक 250 से अधिक पोस्ट-मार्टम स्पर्म रिट्रीवल (पीएमएसआर) प्रक्रियाएं की हैं। इसे दुनिया का सबसे बड़ा डेटा सेट माना जा रहा है। यह शोध जर्नल ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्टिव साइंसेज में प्रकाशन के लिए स्वीकार किया गया है।
भारत में फिलहाल मरणोपरांत प्रजनन को लेकर स्पष्ट कानूनी गाइडलाइन नहीं हैं। ऐसे में यह अध्ययन नीति निर्माण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शोध की सिफारिशें आइसीएमआर को भेजी जाएंगी, जिनके आधार पर भविष्य में केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर प्रोटोकॉल तैयार कर सकती है।
पोस्ट-मार्टम स्पर्म रिट्रीवल (पीएमएसआर) वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी पुरुष की मृत्यु के बाद उसके शरीर से शुक्राणु निकाले जाते हैं। इनका उपयोग आधुनिक प्रजनन तकनीकों की मदद से संतान प्राप्ति के लिए किया जा सकता है।