Anke Gowda- 79 साल के रिटायर्ड चीनी मिल मजदूर अंके गौड़ा ने अपना सपना पूरा करने के लिए दूध भी बेचा और इंश्योरेंस एजेंट के तौर पर भी काम किया
Anke Gowda - किताबों का ऐसा शौक शायद ही अन्य किसी को हो। कर्नाटक के एक रिटायर्ड चीनी मिल मज़दूर अंके गौड़ा ने बचपन से लेकर आजतक की सारी कमाई पुस्तकों पर खर्च कर डाली। मांड्या ज़िले की एक छोटी सी नगरपालिका पांडवपुरा में उन्होंने एक विशाल लाइब्रेरी 'पुस्तका माने' बनवाई जिसमें 20 लाख किताबें हैं। खास बात यह है कि यह पूरी तरह फ्री है; यहां से कोई भी मुफ़्त में पुस्तक पढ़ने के लिए उधार ले सकता है या पढ़ सकता है। लाइब्रेरी में स्कूल सब्जेक्ट और खेती-बाड़ी की गाइड तक हर तरह की किताबें मौजूद हैं। बाइबिल के कुछ दुर्लभ संस्करण भी यहां रखे हैं।
बचपन में अंके गौड़ा के लिए पढ़ना एक सपना था। वह जिस गांव में, खेती-बाड़ी करने वाले परिवार में पले-बढ़े, वहां किताबें विलासिता की वस्तु मानी जाती थीं। पर अंके गौड़ा को पढ़ने की लत थी। उन्हें पुस्तकें बहुत आकर्षित करती थीं, वे अपने माता-पिता और बड़ी बहन से किताबें खरीदने के लिए ही पैसे मांगते थे।
विश्वविख्यात मीडिया संस्थान को दिए एक इंटरव्यू में अंके गौड़ा ने कहा, "जब आप पढ़ना शुरू करते हैं, तो यह एक लत बन जाती है, ठीक वैसे ही जैसे कोई टॉफ़ी चखना।" वे नहीं चाहते थे कि दूसरे बच्चे भी पुस्तकों के लिए वैसा ही अभाव महसूस करें जैसा उन्होंने किया था। बच्चे सिर्फ़ किताबों के पन्नों से आकर्षित होकर उन्हें देखते ही न रह जाएं, बल्कि उसे पढ़ भी सकें, अंके गौड़ा ने इस सपने को भी अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। पिछले पांच दशकों से इसे हकीकत में भी तब्दील कर रहे हैं।
अंके गौड़ा बताते हैं कि, "हमें पढ़ने के लिए कभी किताबें नहीं मिलीं, लेकिन मुझे उनके बारे में हमेशा जिज्ञासा रहती थी। मैं हमेशा सोचता रहता था कि मुझे पढ़ना चाहिए, किताबें जमा करनी चाहिए और ज्ञान हासिल करना चाहिए।" वह हर तरह की किताबें जमा करना चाहते थे, जो "हमारे गाँव के बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने में मदद कर सकें।"
पांडवपुरा में 'पुस्तक माने' एक विशाल इमारत में है जिसे अंके गौड़ा ने एक टीचर से प्रेरित होकर शुरु की। अपने खुद के एक छोटे से कलेक्शन से लाइब्रेरी की शुरुआत की ताकि गांव के दूसरे स्टूडेंट्स भी पढ़ सकें। वे बताते हैं कि "मुझे घर से मिले पैसे जमा करने पड़ते थे। मेरे माता पिता, बहन और दूसरे रिश्तेदार भी इसमें मदद करते थे। मैं टिप भी जमा करता था; मैंने बहुत छोटी-छोटी रकम से शुरुआत की थी।"।
स्कूल के बाद उन्होंने बस कंडक्टर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था लेकिन कुछ ही माह बाद उनकी मुलाकात अपने पुराने टीचर से हुई। उन्होंने पढ़ाई छोड़ने पर हैरानी जताते हुए गौड़ा से ज़ोर देकर कहा कि वह नौकरी छोड़कर कॉलेज जाएं। गौड़ा ने उनकी सलाह मानी और कन्नड़ में पोस्टग्रेजुएट डिग्री हासिल की, जिसके बाद उन्होंने एक स्थानीय चीनी मिल में काम करना शुरू कर दिया।
अंके गौड़ा अपनी सैलरी का दो-तिहाई हिस्सा किताबों पर खर्च करते थे और बाकी पैसे अपने परिवार के लिए इस्तेमाल करते थे। मिल में काम करने के 33 सालों के दौरान उन्होंने 'कन्नड़ साहित्य परिषद' के कई सम्मेलनों में हिस्सा लिया और यहां से रियायती दरों पर किताबें खरीदते रहे। अपने सपने को और आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने गायें पालीं और दूध बेचा, साथ ही एक इंश्योरेंस एजेंट के तौर पर भी काम किया।
किताबों को पहले उन्होंने ट्रंक [धातु के बड़े बक्सों] में रखना शुरू किया। फिर घर में किताबों की अलमारियां बनवाईं। लेकिन एक समय ऐसा आया, जब घर में कहीं भी जगह नहीं बची थी। ऐसे में इलाके के एक बड़े कारोबारी हरि खोडे ने एक लाइब्रेरी के लिए विशाल इमारत बनवाने का खर्च उठाया। 15800 वर्ग फुट में फैली इस इमारत में अब दो और इमारतें भी जोड़ दी गईं।
अंके गौड़ा अपनी पत्नी और बेटे के साथ लाइब्रेरी के ही एक कोने में रहते हैं। यह लाइब्रेरी हफ़्ते के सातों दिन खुली रहती है। गौड़ा खुद ही यहां के लाइब्रेरियन हैं। अलमारियों के अलावा कई किताबें ज़मीन पर भी बेतरतीब ढंग से ढेर बनाकर रखी हुई हैं। इमारत के बाहर, लगभग 8 लाख (800000) किताबों से भरे बोरे अभी भी खुलने का इंतज़ार कर रहे हैं। अक्सर इस लाइब्रेरी में आनेवाली एसोसिएट प्रोफ़ेसर शिल्पाश्री हरानू के अनुसार लाइब्रेरी भले ही व्यवस्थित न हो, लेकिन यह किताबों का एक विशाल सागर है। उन्होंने आगे कहा, "हमें यह भले ही अस्त-व्यस्त लगे, लेकिन अंके गौड़ा को ठीक-ठीक पता होता है कि कौन-सी किताब कहां रखी है।"
जनवरी 2026 में अंके गौड़ा को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान-'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया। गौड़ा का कहना है कि भविष्य में, उनकी इस विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी अब दूसरों की होगी।