MP News: मरीज डॉक्टर के पास जाने के बजाय इंटरनेट और एआई प्लेटफॉर्म्स पर अपनी बीमारी का इलाज खोजने लगते हैं और उसी पर भरोसा कर लेते है....
MP News: डिजिटल युग में जहां तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं इसका एक खतरनाक पहलू भी सामने आ रहा है। शहर में तेजी से एक नई मानसिक प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसे विशेषज्ञ 'साइबरकॉन्ड्रिया' का नाम दे रहे है। इसमें मरीज डॉक्टर के पास जाने के बजाय इंटरनेट और एआई प्लेटफॉर्म्स पर अपनी बीमारी का इलाज खोजने लगते हैं और उसी पर भरोसा कर लेते है। मनोचिकित्सकों के अनुसार, यह समस्या अब आम होती जा रही है। मरीज न केवल अपने लक्षण बल्कि ब्लड रिपोर्ट तक एआई में डालकर खुद ही बीमारी का निष्कर्ष निकाल लेते हैं और दवाइयां भी उसी आधार पर शुरू कर देते हैं।
इस बारे में मनोचिकित्सक डॉ. राहुल शर्मा से पूछने पर उन्होंने बताया कि साइबरकॉन्ड्रिया में मरीज को इंटरनेट से मिली जानकारी पर अत्यधिक विश्वास हो जाता है। वह डॉक्टर से ज्यादा एआई को सही मानने लगता है, जो बहुत ज्यादा खतरनाक है। सर्च इंजन अक्सर लक्षणों को बढ़ा-चढ़ाकर लोगों को दिखाते है। इससे मरीज को लगता है कि उसे गंभीर बीमारी है, जिससे वह मानसिक तनाव में आ जाता है और कई बार गलत दवाइयां लेने लगता है। ऐसा करना शरीर के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है।
केस- 1
34 वर्षीय विनोद तिवारी (परिवर्तित नाम) को तेज बुखार, एलर्जी और सिरदर्द की शिकायत थी। डॉक्टर ने सामान्य जांच के बाद इलाज शुरू किया, लेकिन विनोद ने अपनी ब्लड रिपोर्ट एआई प्लेटफॉर्म पर डाल दी। एआई ने कुछ अतिरिक्त बीमारियां बताई, जिसके बाद उन्होंने एआई द्वारा सुझाई गई दवाएं ली, जिसके बाद उनकी हालत और बिगड़ने लगी।
केस- 2
29 वर्षीय प्रमोद सोनी (परिवर्तित नाम) को लंबे समय से चक्कर और सिरदर्द की समस्या थी। उन्होंने भी एआई से सलाह लेकर टेस्ट करवाए और रिपोर्ट के आधार पर दवाइयां शुरू कर दीं। परिजनों के समझाने पर भी उन्होंने कहा कि एआई पर बड़े-बड़े देश अमेरिका काम कर रहे हैं, यह गलत नहीं हो सकता।
जब कोई व्यक्ति अपने स्वास्थ्य को लेकर अत्यधिक चिंतित रहने लगे और बार-बार इंटरनेट पर बीमारियों के लक्षण खोजकर खुद को गंभीर बीमार मान ले, तो इसे चिकित्सा विज्ञान में साइबरकॉन्ड्रिया कहा जाता है। यह 'हाइपोकॉन्ड्रिया' का डिजिटल अवतार है।