लोगों ने शेयर की 1963 की दिवाली, तब 82 रुपए तोला था सोना, पढ़िए ऐसे ही मजेदार किस्से

उजास और उल्लास के त्योहार दिवाली को सभी अपने ढंग से सेलिब्रेट करते हैं। पूजा-पाठ, दीयों की रोशनी, फुलझडिय़ों की सतरंगी उजास और पटाखों की आवाज यादगार बन जाते हैं। दिवाली मनाने में समय के साथ कई बदलाव आए।

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Oct 22, 2016
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कोलार/शाहपुरा. उजास और उल्लास के त्योहार दिवाली को सभी अपने ढंग से सेलिब्रेट करते हैं। पूजा-पाठ, दीयों की रोशनी, फुलझडिय़ों की सतरंगी उजास और पटाखों की आवाज यादगार बन जाते हैं। दिवाली मनाने में समय के साथ कई बदलाव आए। कहीं महंगाई का असर है तो कहीं देसी-विदेशी वस्तुओं का, लेकिन दिवाली आज भी अनंत उत्साह के साथ मनाई जाती है। शहर के सीनियर सिंटीजंस उनके बचपन और युवावस्था की दिवाली की यादें पत्रिका के जरिये शेयर कर रहे हैं।



खोखली चाबी का पटाखा
हमारे समय में सोना 82 रुपए तोला था। 1963 में नौकरी में आए थे। पहली तनख्वाह 255 रुपए थी। मैंने पहली सेलरी में 120 रुपए की साइकिल खरीदी तो लोगों में चर्चा हुई थी। उस समय साइकिल लेना बहुत बड़ी बात थी। तब शुद्ध घी या तिल के तेल में खाना बनता था। उस समय ऐसे ताले चलन में थे जिनकी चाबी खोखली होती थी। खोखले हिस्से में माचिस की तीली का मसाला और गंधक, पोटाश का डालकर कील से ठोंकते थे, जिससे पटाखे की आवाज होती थी। इसके सिवाय नाल में गंधक-पोटाश भरकर जमीन पर मारकर आवाज करते थे।
डॉ. आरएन सक्सेना, रिटायर्ड डॉक्टर



एक रुपए में ढाई ली. दूध
पड़ोसी को पटाखे चलाते देख जो खुशी होती थी, उसकी याद आज भी रोशन है। पड़ोसी को खुश देखकर खुद भी खुश हो जाते थे। मुझे शुरू में 156 रुपए वेतन मिलता था, जिसमें घर भी भेजते थे और अपना खर्च चलाते थे। एक रुपए का ढाई लीटर दूध मिलता था। बरफी, पेड़े ही मिठाइयां थीं। एक बार दिवाली की रात एक किसान की गाय बीमार हो गई। मुझे बच्चों के लिए मिठाई लानी थी, लेकिन पहले मैंने गाय को ठीक किया। यह दिवाली से ज्यादा सुखद था।
डॉ. एमएम तट्टे, रिटायर्ड डायरेक्टर, पशुपालन


फुलझडिय़ां से आतिशबाजी
बचपन में रतलाम में रहते थे। दिवाली सामूहिक रूप से मनाई जाती थी। घेवर और मक्खनवाला दो ही मिठाइयां थीं। मक्खनवाला मिठाई बालूशाही जैसी होती थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि दूध तीन आना सेर मिलता था। शुद्ध देशी घी पांच रुपए किलो था। शक्कर 12 आना किलो के भाव बिकती थी। जब 1963 में पीएचई डिपार्टमेंट में जूनियर इंजीनियर बना तो 250-300 का ग्रेड था। यह सेलरी बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। तब पटाखों का चलन ही न के बराबर था। फुलझडिय़ां ही दिवाली की पूरी आतिशबाजी मान ली जाती थी।
केसी राठौर, रिटायर्ड चीफ इंजीनियर पीएचई



डेढ़ महीने का था त्योहार
अरे साहब... तब सस्ते का जमाना था। मैं 1958 में तहसीलदार बना था, तब रुपए का बहुत महत्व था। हमारे समय में लोकल दुकानदार कागज से बने पटाखे बेचते थे। कागज को रोल करके उनमें रुई, गंधक, पोटाश आदि भरकर ये पटाखे बनाए जाते थे। एक आना के 12 पटाखों का एक पैकेट मिलता था। अनार और फुलझड़ी भी खरीदते थे। बम और रॉकेट जैसी आतिशबाजी नहीं थी। रबड़ी भी खूब खाते थे। दिवाली के महीने भर पहले और 15 दिन बाद तक त्योहार ही चलता था।
आरएस त्रिपाठी, रिटायर्ड सुपरिंटेंडेंट, सेन्ट्रल सप्लाई डिपा.


Published on:
22 Oct 2016 12:46 pm
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