bhopal news: लो-फ्लोर बस सेवा की गहराती संकट कहानी, बिगड़ता सिस्टम, बढ़ती निर्भरता और यात्रियों की टूटती उम्मीदें
bhopal news: मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में किफायती, सुलभ और समावेशी परिवहन व्यवस्था का सपना लेकर शुरू की गई लो-फ्लोर बस सेवा आज गंभीर संकट से गुजर रही है। वर्षों पहले जिस सेवा को शहरी जीवन की 'रीढ़' माना गया था, वही अब अव्यवस्था, संसाधनों की कमी और कमजोर प्रबंधन के कारण अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है। हालात यह हैं कि रोजाना हजारों यात्री मजबूरी में इस सेवा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन संतुष्टि का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।
शहर के प्रमुख बस स्टॉप- न्यू मार्केट, बोर्ड ऑफिस, एमपी नगर, कोलार और करोंद पर सुबह-शाम भीड़ का दबाव चरम पर होता है। 30 से 45 मिनट तक बस का इंतजार, बस आने पर चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की, कई यात्रियों का छूट जाना रोजाना की बात हो चुकी है। एक निजी कर्मचारी बताते हैं, बस पकड़ना अब रोज का संघर्ष बन गया है, कई बार देर से पहुंचने पर नौकरी पर भी असर पड़ता है। लो-फ्लोर बस सेवा का संकट केवल परिवहन का मुद्दा नहीं, बल्कि शहर के भविष्य से जुड़ा सवाल है। अगर समय रहते इस व्यवस्था को पटरी पर नहीं लाया गया, तो आने वाले समय में ट्रैफिक, प्रदूषण और शहरी अव्यवस्था और गंभीर हो जाएगी। अब जिम्मेदार एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे इस बिगड़ती व्यवस्था को सुधारने के लिए ठोस और समयबद्ध कदम उठाएंगी, या शहरवासी यूं ही समस्याओं से जूझते रहेंगे?
परिवहन विभाग की आंतरिक स्थिति भी इस समस्या की बड़ी वजह है। बड़ी संख्या में बसें वर्कशॉप में खड़ी,स्पेयर पार्ट्स की कमी, पुराने हो चुके वाहनों की लगातार खराबी, इन कारणों से बसों की उपलब्धता घटती जा रही है। जो बसें सड़क पर हैं, वे भी ओवरलोड के कारण जल्दी खराब हो जाती हैं। शहर में कई रूट ऐसे हैं जहां यात्रियों की संख्या अधिक है, लेकिन बसों की उपलब्धता बेहद कम है। वहीं कुछ रूट पर बसें खाली चलती दिखाई देती हैं। यह असंतुलन बताता है कि डाटा आधारित प्लानिंग का अभाव है, मांग के अनुसार रूट का पुनर्गठन नहीं किया गया, निगरानी तंत्र कमजोर है, समयपालन पूरी तरह प्रभावित है। लो-फ्लोर बस सेवा का टाइम टेबल अब केवल कागजों तक सीमित रह गया है। बसें तय समय से काफी देर से पहुंचती हैं,कई बार बिना सूचना के ट्रिप कैंसिल,यात्रियों को कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है इसका सबसे ज्यादा असर छात्रों, नौकरीपेशा लोगों और दैनिक यात्रियों पर पड़ रहा है।
लो-फ्लोर बसों की सबसे बड़ी समस्या उनकी कम संख्या है, जब तक बसों का फेरा नहीं बढ़ाया जाएगा, तब तक भीड़ और देरी की समस्या बनी रहेगी। प्रशासन को चाहिए कि नई बसें जल्द शामिल करे, और खराब बसों को प्राथमिकता से दुरुस्त किया जाए, साथ ही, पीक टाइम में अतिरिक्त बसें चलाना जरूरी है।
अंशुल सिंह रावत,स्टूडेंट
समस्या केवल बसों की संख्या की नहीं, बल्कि उनके मैनेजमेंट की भी है, कई रूट पर जरूरत से कम बसें हैं, जबकि कुछ रूट पर बसें खाली चलती हैं, प्रशासन को डेटा के आधार पर रूट प्लानिंग करनी चाहिए और जीपीएस सिस्टम को प्रभावी बनाना चाहिए, ताकि बसों का संचालन संतुलित हो सके।
राकेश सिंह बिष्ट,स्थानीय
लो-फ्लोर बसों की हालत काफी खराब है, सफाई, सीटों की स्थिति और वेंटिलेशन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, अगर यात्रियों को बेहतर सुविधा नहीं मिलेगी, तो वे बसों का उपयोग कम करेंगे, नियमित मेंटेनेंस, साफ-सफाई और बेसिक सुविधाओं को सुधारना बहुत जरूरी है।
जुनेद मंसूरी,यात्री
दिव्यांग और बुजुर्गों के लिए शुरू की गई यह सेवा अब उनके लिए ही मुश्किल बन गई है क्योंकि बसें स्टॉप पर सही से नहीं रुकतीं और भीड़ इतनी होती है कि चढ़ना-उतरना कठिन हो जाता है, ड्राइवर और कंडक्टर को संवेदनशीलता के साथ प्रशिक्षण देना चाहिए और नियमों का सख्ती से पालन कराना चाहिए।
माधव प्रसाद गौड़,पूर्व शिक्षक
लो-फ्लोर बस सेवा की खराब स्थिति का असर ट्रैफिक पर भी पड़ रहा है, लोग मजबूरी में निजी वाहन इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे जाम और प्रदूषण बढ़ रहा है,अगर बस सेवा को मजबूत किया जाए, तो शहर की ट्रैफिक समस्या भी काफी हद तक कम हो सकती है, इसके लिए सरकार को इसे प्राथमिकता में रखना होगा।
संदीप साहू,समाजसेवी
समस्या का स्थायी समाधान तभी होगा जब पूरी व्यवस्था को तकनीकी रूप से मजबूत किया जाए, रियल टाइम ट्रैकिंग, मोबाइल ऐप, डिजिटल टिकटिंग और शिकायत निवारण सिस्टम को बेहतर बनाना चाहिए, यात्रियों को सही समय पर जानकारी मिलेगी तो उनका भरोसा भी बढ़ेगा और सेवा का उपयोग भी।bhopal