भोपाल

मां बनने के लिए डील! डिलिवरी को बना दिया 54 हजार करोड़ की बीमारी

Cesarean Delivery: मध्य प्रदेश की राजधानी समेत देशभर में तेजी से बढ़ रहे सिजेरियन डिलीवरी के मामले, इसके पीछे की सच्चाई चौंकाने वाली, आंकड़े और अस्पतालों का बड़ा खेल, पत्रिका की मंडे स्पेशल न्यूज में पढ़े भारत में 'सी-सेक्शन का कारोबार'

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Apr 27, 2026
Cesarean delivery in India(photo:patrika creative)

Cesarean Delivery Shocking Truth: मां बनने की प्रक्रिया अब सिर्फ कुदरत का नहीं, पैसे और सुविधा का सवाल भी बनती जा रही है। डॉक्टरों ने प्रसूता को मरीज और प्रसव को बीमारी बना दिया। भोपाल के निजी अस्पतालों में हर दूसरा बच्चा सर्जरी की टेबल पर पैदा हो रहा है, तो सरकारी अस्पतालों में हर तीसरी प्रसूता सर्जरी का सामना कर रही है। प्रदेश के बाकी बड़े शहरों का भी यही ट्रेंड है। राष्ट्रीय औसत में हर चौथा बच्चा सिजेरियन हो रहा है। यह सारा खेल हाई रिस्क प्रेगनेंसी के नाम पर हो रहा है।

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प्रसूता के भर्ती होते ही शुरू होता है डर का मानसिक खेल

निजी अस्पतालों का हाल यह है कि प्रसूता के भर्ती होते ही डर का मानसिक खेल शुरू हो जाता है। वार्ड से लेकर प्रसव कक्ष तक का माहौल ऐसा कि डरे-सहमे परिजन के पास सिजेरियन की सहमति देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यही वजह है कि बीते दस वर्ष में प्रदेश में सिजेरियन से जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है।

निजी अस्पतालों में 45 फीसदी से ज्यादा सीजेरियन प्रसव भोपाल में

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के आंकड़ों के अनुसार निजी अस्पतालों में 45 प्रतिशत से अधिक प्रसव सिजेरियन से हो रहे हैं, भोपाल के सरकारी अस्पतालों में यह अनुपात 34 प्रतिशत के करीब है। यानी एक ही प्रदेश, एक ही मां, एक ही बच्चा लेकिन अस्पताल बदलते ही डिलीवरी का तरीका बदल जाता है।

सेफ डिलीवरी का मतलब महंगा ऑपरेशन

केस 1

भोपाल के एक परिवार ने बताया कि न कोई आपात स्थिति थी, न दर्द असहनीय था। डॉक्टर ने कहा, नॉर्मल में समय लगेगा, सिजेरियन सुरक्षित और जल्दी होगा। लगा बच्चे या मां को कुछ नहीं हो जाए। इसी डर के आगे सवाल दब गए।

केस 2

निजी अस्पताल में भर्ती 26 वर्षीय महिला से डॉटर ने कहा, नॉर्मल डिलीवरी का रिस्क मत लीजिए, सिजेरियन ही सुरक्षित है। दर्द बढ़ा तो मन में डर बैठ गया, सहमति दी और ऑपरेशन से स्वस्थ बच्चे का जन्म हुआ। बिल आया 85 हजार।

मां और बच्चे पर असर

सिजेरियन जीवनरक्षक सर्जरी है, इसमें कोई विवाद नहीं। जब यह जरूरत से ज्यादा हो, तो साइड इफेक्ट भी बढ़ते हैं। मां के लिए संक्रमण और अगली प्रेग्नेंसी में जटिलताएं। बच्चे में शुरुआती इम्युनिटी और स्तनपान से जुड़ी दिक्कतें। परिवार पर आर्थिक बोझ।

डॉक्टरों के अनुसार सिजेरियन से जन्मे बच्चों में आगे चलकर एलर्जी, मोटापा, इम्युनुटी से जुड़ी समस्याएं अपेक्षाकृत ज्यादा देखी गईं। मां के लिए अगली गर्भावस्था में ब्लीडिंग, प्लेसेंटा जटिलता और बार-बार ऑपरेशन का खतरा। लंबे समय तक दवाइयों और फॉलोअप का खर्च।

54 हजार करोड़ का चीरा-टांका

निजी अस्पतालों में आधी से ज्यादा गर्भवती महिलाएं अचानक ही हाई रिस्क हो जाने पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। दरअसल, यह खेल करोड़ों रुपए का है। देश में वर्ष 2024-25 में 1.97 करोड़ प्रसव में से 54 लाख बच्चे ऑपरेशन टेबल पर हुए। औसतन एक सिजेरियन पर एक लाख रुपए का खर्च जोड़ दें, तो आंकड़ा 54 हजार करोड़ से ज्यादा होता है। अकेले भोपाल में औसतन 200 करोड़ रुपए कमाए गए।

हर साल बढ़ रहे सर्जरी के केस

भोपाल - सरकारी - सामान्य/सिजेरियन ----- निजी - वर्ष सामान्य/सिजेरियन

2020-21 - 21992/7108 ----- 15314/7133

2021-22 - 21995/7439 ----- 14897/4579

2022-23 - 24844/8033 ----- 11380/7139

2023-24 - 23010/10294 ---- 17191/6645

2024-25 21398/11083 ----- 10420/8090

राष्ट्रीय औसत लगातार बढ़ा

वर्ष - कुल प्रसव - सिजेरियन

2020-21 - 20386280 - 4098969

2021-22 - 20410730 - 4533190

2022-23 - 20963598 - 4993291

2023-24 - 20351261 - 5143156

2024-25 - 19789406 - 5434735

अब महिलाएं प्रसव पीड़ा सहन नहीं करना चाहतीं

सीजर से प्रसव के लिए महिलाएं और डॉक्टर, दोनों जोर दे रहे हैं। अब महिलाएं प्रसव पीड़ा सहन नहीं करना चाहतीं। डॉक्टर भी नॉर्मल डिलीवरी कराने का जोखिम नहीं लेना चाहते। इसलिए सीजर से प्रसव के मामले बढ़ रहे हैं। ज्यादा उम्र में शादी और गर्भधारण करने या गर्भवती महिलाओं को जटिल समस्याएं, बीमारी होने के कारण भी सिजेरियन प्रसव बढ़े हैं।

-डॉ. अजय हलदर, स्त्री रोग विशेषज्ञ, एम्स भोपाल

प्रसव को लेकर भय, अनिश्चितता और दर्द की आशंका ज्यादा

शहरी जीवनशैली में प्रसव को लेकर भय, अनिश्चितता और दर्द की आशंका महिलाओं में ज्यादा देखी जा रही है। प्लानिंग और कंट्रोल की मानसिकता, शुभ मुहूर्त या सुविधाजनक समय चुनने की इच्छा और परिवार का दबाव भी निर्णय को प्रभावित करते हैं। ऐसे में जरूरी है कि गर्भवतियों को सही परामर्श, भावनात्मक समर्थन, प्रसव के प्रति यथार्थवादी जानकारी दी जाए, ताकि निर्णय भय नहीं, बल्कि संतुलित समझ के आधार पर लिया जाए।

- डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी, वरिष्ठ मनोचिकित्सक, भोपाल

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Published on:
27 Apr 2026 09:43 am
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