
भोपाल। मध्यप्रदेश के 64वें स्थापना दिवस समारोह में गुलाम साबिर निजामी बंधु ने प्रस्तुति दी। उन्होंने सूफी कव्वाली पेश की। उन्होंने बताया कि हमारे परिवार में दस से ज्यादा पीढिय़ा कव्वाली से जुड़ी हुई हैं। पिछले 700 सालों से हम खुदा की इबादत में जुटे हैं। हम कव्वाली को संगीत साधना से बढ़कर खुद को खुदा से जोडऩे का जरिया मानते हैं। हमारे बाद हमारे बच्चे भी इसी पंरपरा को संभाल रहे हैं।
निजामी बंधुओं ने समारोह में प्यार किए जा प्यार इबादत है प्यार ही पूजा है... से कार्यक्रम की शुरुआत की। उनका कहना था कि आज हिन्दुस्तान की आवाम को प्यार की सबसे ज्यादा जरूरत है। कव्वाली का न तो कोई धर्म होता है न ही कोई भाषा। इसे हिन्दी-उर्दू या किसी अन्य भाषा में नहीं बांधा जा सकता। हम सूफीयाना कव्वाली, अरबी और पर्शियन में भी गाते हैं। संगीत में मंजिल सभी की एक है, बस रास्ते अलग-अलग है।
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने दिया गिफ्ट
अफगानिस्तान का एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि करीब 14 साल पहले हिन्दुस्तान से एक दल वहां प्रस्तुति देने गया था। हमने वहां पर्शियन में कव्वाली पेश की तो उन्होंने वहां की पारंपरिक पोशाकें गिफ्ट कीं। वहीं, उन्होंने बताया कि हाल ही में हमने रूस में भी भारत सरकार की ओर से कव्वाली की प्रस्तुति दी थी। यहां 14 देशों का प्रतिनिधि मंडल आया था।
उन्होंने मेरे साकी मुझे तु अपने आंखों से पिला देना, अगर पीकर बहक जाऊं तो सुली पर चढ़ा देना... पेश की। उन्होंने वृंदावन का एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि तोरे बिना मोहे चैन नहीं, बृज के नंदलाला, पय्या पढ़ू बिनती करूं, डालूं गले माला... पेश किया तो सभी ने दाद दी। ये भजन करीब 600 साल पुराना है। निजामी बंधुओं ने अमीर खुसरो की रचना छाप तिलक सब छिनी, मोसे नैना मिला के... पेशकर समा बांध दिया। मेरे रश्के कमर तूने पहली नजर... गीत से कार्यक्रम का समापन किया।