भोपाल

ब्रोकर करवाते थे टेंडर फिक्सिंग, काम मिलने के बाद विनय-वरुण को मिलता था सर्विस चार्ज

ईओडब्ल्यू के लिए नगद लेनदेन बन सकती है मुसीबत, अब तक एक ही टेंडर में हुआ लेनदेन का खुलासा  

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Apr 26, 2019
e tender

भोपाल. ई-टेंडर घोटाले में ईओडब्ल्यू को अब तक की जांच में महत्वपूर्ण लिंक हाथ लगे हैं। पूछताछ और इलेक्ट्रॉनिक डाटा से यह बात सामने आई हैं कि ई-टेंडरों की फिक्सिंग ब्रोकरों के जरिए होती थी। ऑस्मो सॉल्यूशन, इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कारपोरेशन और टेंडर जारी करने वाले विभागों के बीच ब्रोकर बड़ा किरदार होता था।

हर टेंडर में ब्रोकर को बिड वेल्यू की 0.5 फीसदी रकम एडवांस में मिल जाती थी, इसके बाद टेंडर में टेंपरिंग आदि का काम शुरु होता था। टेंपरिंग आदि का काम ऑस्मो आईटी कंपनी के संचालक करते थे।

इधर, ईओडब्ल्यू के अफसरों ने 2013 से 2018 तक के सभी टेंडरों की लिस्ट संबंधित विभागों से मांगी है, ताकि हर टेंडर की जांच की जा सके। अब जांच की जद में ब्रोकर भी आएंगे। पढि़ए कैसे काम करता था यह गिरोह और किसकी क्या भूमिका है-

सबकी अलग-अलग भूमिकाएं थी घोटाले में

1 पहला चरण-

ऑस्मो आईटी सॉल्यूशन कंपनी के वरुण व विनय के पास टेंडर करने वाले हर विभाग की प्राइवेट और पब्लिक ‘की’ होती थी। जिसके जरिए वे टेंडर में कितनी कंपनियों-ठेकेदारों ने हिस्सा लिया पता लगाते थे। फाइनेंशियल बिड के समय टेंडर में कंपनियों द्वारा लिखे गए बिड वेल्यू

देख लेते थे। इसके बाद वे ब्रोकरों से संपर्क करते थे। बताया जा रहा है कि ब्रोकर एक टेंडर के लिए एक बार में एक ही सिम का इस्तेमाल करते थे। जिसके जरिए टेंडर की फिक्सिंग होती थी। एसईडीसी के तत्कालीन एवं निलंबित ओएसडी एनके ब्रह्मे के जरिए भी ठेकेदार-कंपनियों के फोन नंबर और नाम पते आदि की जानकारी ऑस्मो कंपनी तक पहुंचती थी।

2 दूसरा चरण- ब्रोकर को विनय-वरुण से टेंडरों में शामिल ठेकेदारों और उनके द्वारा बताई गई दरें पता चलती थी। इसके बाद ब्रोकर ठेकेदारों से संपर्क करते थे। वह ग्राहक कहलाते थे। ठेकेदार, ब्रोकरों से ही लेनदेन की बात तय करते थे।

ब्रोकर ही ठेकेदारों को बताते थे कि कितनी दर फिक्स करना हैं, ताकि टेंडर मिल जाए। ब्रोकर को टेंडर में शामिल सभी की दर पता होने से वह उनसे कम दर टेंडर में डलवाते थे। ब्रोकरों को इसके बदले में टेंडर का कुल 0.5 फीसदी पैसा एडवांस में मिलता था। इसके बाद वह टेंडर फिक्स करवाते थे।

3 तीसरा चरण- ई-टेंडर के मैसेज की कोडिंग-डीकोडिंग करते थे ऑस्मो आईटी सॉल्यूशन कंपनी के वरुण चतुर्वेदी और विनय चौधरी। जिस विभाग का टेंडर होता था, उसकी फाइनेंशियल बिड में शामिल ठेकेदारों की बिड वेल्यू को डिजीटल सिग्नेचर ‘की’ की मदद से कोड-डीकोड करते थे। मैसेज को एक कोड के जरिए ठेकेदारों को भेजा जाा था। इसे इंक्रिप्ट (मेसेज भेजने वाला) कहा गया। इंक्रिप्ट किए गए मेसेज को डीक्रिप्ट (मेसेज पाने वाला) करके पढ़ता था। इसके लिए टेंडर अथॉरिटी की पब्लिक डिजिटल ‘की’ का इस्तेमाल किया गया। विनय-वरुण के पास विभाग की प्राइवेट और पब्लिक ‘की’ दोनों होती थी। इस प्रक्रिया में वरुण और विनय के मोबाइल नंबर और इंटरनेट-आईपी एड्रेस का उपयोग किया गया।

4. चौथा चरण- टेंडर अवॉर्ड होने के बाद संबंधित कंपनी-ठेकेदार ब्रोकर के जरिए ही ऑस्मो आईटी कंपनी, संबंधित विभाग, एसईडीसी के अफसर, आदि को ब्रोक्रेज (पैसा) पहुंचाते थे। टेंडर बिड वेल्यू का कुल 1 से 2 फीसदी तक लेनदेन होता था।

अधिकांश लेनदेन नगद में की गई है। अब तक सिर्फ एक ही टेंडर में ब्रोक्रेज बैंक के जरिए ऑस्मो आईटी सॉल्यूशंस कंपनी के खाते में पकड़ में आ पाई है। बताया जा रहा है कि यह लेनदेन नगद, गिफ्ट, सोना, डायमंड संपत्ति आदि में भी की गई होगी। लेकिन इसका पता लगाने में मुश्किल आ रही है।

5 पांचवा चरण- जब टेंडर फिक्स हो जाता था और ठेकेदार-कंपनियां काम शुरु कर देती, तब ठेकेदार/कंपनी ऑस्मो आईटी सॉल्यूशंस कंपनी को सर्विस चार्ज के रुप में अलग से भुगतान करती थी। ठेकेदार, ऑस्मो आइटी कंपनी के ग्राहक बन जाते थे।

बैंक के जरिए लेनदेन की पुष्टि
अब तक की 9 टेंडरों की जांच में ईओडब्ल्यू के अधिकारियों को एक टेंडर में बैंक के जरिए लेनदेन की पुष्ठि हुई हैं। यह वह टेंडर हैं, जिसमें संबंधित ठेकेदार-कंपनी (एल-1) को टेंडर मिल चुका था, लेकिन ब्रोकर और अन्य को तय पैसा नहीं मिला तो संबंधित कंपनी को वर्क ऑर्डर नहीं दिया। बाद में टेंडर ही निरस्त कर दिया गया। यह लेनदेन ठेकेदार और ऑस्मो आईटी कंपनी के खातों से खातों में हुआ है। जब काम नहीं मिला तो तय राशि ऑस्मो आईटी कंपनी ने संबंधित ठेकेदार को लौटा दी।

एंटेरस कंपनी के अधिकारी से तीसरे दिन भी पूछताछ

एंटेरस सिस्टम्स प्रालि कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट मनोहर एमएन से तीसरे दिन भी पूछताछ जारी रही। मनोहर अपने वकील को साथ लाए हैं। किसी भी तरह की कानूनी प्रक्रिया में वह तत्काल अपने वकील से सलाह ले रहे हैं। अभी तक तीन पदाधिकारियों से पूूछताछ की गई है। मप्र का काम देखने वाले तीन लोगों को और भी बुलाया गया हैं। अब तक इनसे पूछताछ में मुख्य रुप से डाटा का क्रॉस वेरिफिकेशन करने में मदद ली गई हैं। वहीं जब्त किए गए डाटा के बारे में भी विस्तार से पूछताछ चल रही है।

Updated on:
26 Apr 2019 08:00 am
Published on:
26 Apr 2019 10:38 am
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