नवरात्र के इन खास नौ दिनों में कई श्रद्धालु बड़ी उम्मीदों से यहां पहुंचते हैं कि मां का आशीर्वाद मिले और उनकी कृपा से उनके सारे काम बने, वहीं कुछ भक्त ऐसे हैं जो मनोकामना पूरी होने पर मां को धन्यवाद अर्पित करने यहां आते हैं। आप भी जानें हरसिद्धि माता मंदिर के बारे में ये इंट्रेस्टिंग फैक्ट्स...
बैरसिया तहसील मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 35 किलोमीटर दूर है। यहां के तरावली गांव में माता का अद्भुत स्थान है। इस रहस्यमयी चमत्कारी माता मंदिर को हरसिद्धि माता मंदिर कहकर पुकारा जाता है। कहा जाता है कि हरसिद्धि माता के दरबार में जो भी अर्जी लगाता है मां उसे जल्द पूरी करती हैं। माता रानी के इस दरबार की खासियत यह है कि यहां आकर मन्नत मांगने वाले श्रद्धालु मंदिर के सीधे नहीं बल्कि उल्टे फेरे लगाते हैं। मान्यता भी है कि यहां उलटे फेरे लगाने वालों के बिगड़े काम संवर जाते हैं। नवरात्र आने को हैं। नवरात्र के इन खास नौ दिनों में कई श्रद्धालु बड़ी उम्मीदों से यहां पहुंचते हैं कि मां का आशीर्वाद मिले और उनकी कृपा से उनके सारे काम बने, वहीं कुछ भक्त ऐसे हैं जो मनोकामना पूरी होने पर मां को धन्यवाद अर्पित करने यहां आते हैं। आप भी जानें हरसिद्धि माता मंदिर के बारे में ये इंट्रेस्टिंग फैक्ट्स
मन्नत मांगने ऐसे लगाते हैं अर्जी
तरावली स्थित मां हरसिद्धि धाम में वैसे तो सामान्य रूप से सीधी परिक्रमा ही की जाती है, लेकिन कुछ श्रद्धालु मां से खास मनोकामना के लिए उलटी परिक्रमा कर अर्जी लगा जाते हैं, बाद में जब मनोकामना पूरी हो जाती है तब, सीधी परिक्रमा कर माता को धन्यवाद देने जरूर आते हैं। भर जाती है सूनी गोद मान्यता है कि जिन भक्तों को कोई भी संतान नहीं होती है। वह महिलाएं मंदिर के पीछे नदी में स्नान करने के बाद मां की आराधना करती है। इसके बाद उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है।
राजा विक्रमादित्य लाए थे माता रानी की ये मूर्ति
तरावली के मंहत मोहन गिरी बताते हैं कि वर्षों पूर्व जब राजा विक्रमादित्य उज्जैन के शासक हुआ करते थे। उस समय विक्रमादित्य काशी गए थे। यहां पर उन्होंनें मां की आराधना कर उन्हें उज्जैन चलने के लिए तैयार किया था। इस पर मां ने कहा था कि एक तो वह उनके चरणों को यहां पर छोड़कर चलेंगी। इसके अलावा जहां सबेरा हो जाएगा। वह वहीं विराजमान हो जाएंगी। इसी दौरान जब वह काशी से चले तो तरावली स्थित जंगल में सुबह हो गई। इससे मां शर्त के अनुसार तरावली में ही विराजमान हो गईं। इसके बाद विक्रमादित्य ने लंबे समय तक तरावली में मां की आराधना की। फिर से जब मां प्रसन्न हुई तो वह केवल शीश को साथ चलने पर तैयार हुई। इससे मां के चरण काशी में है, धड़ तरावली में है और शीश उज्जैन में है। उस समय विक्रमादित्य को स्नान करने के लिए जल की आवश्यकता थी। तब मां ने अपने हाथ से जलधारा दी थी। इससे वाह्य नदी का उद्गम भी तरावली के गांव से ही हुआ है और उसी समय से नदी का नाम वाह्य नदी रखा गया है।
खप्पर से की जाती है पूजा
तरावली स्थित मां हरसिद्धि के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा है। यहां माता के धड़ की पूजा होती है, क्योंकि मां के चरण काशी में है और शीश उज्जैन में। इससे जितना महत्व काशी और उज्जैन का है उतना ही महत्व इस तरावली मंदिर का भी है। यहां आज भी मां के दरबार में आरती खप्पर से की जाती है।