
Bhopal news:मध्यप्रदेश में अवैध कॉलोनियों का फैलाव रोकने के लिए सख्त कानून बनाने की कवायद दो साल बाद भी अंजाम तक नहीं पहुंच पाई है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने नियमों में संशोधन कर अवैध कॉलोनाइजरों पर शिकंजा कसने की तैयारी की थी। जुलाई के विधानसभा सत्र में संशोधन विधेयक पेश करने का दावा भी किया, लेकिन प्रस्तावित बदलावों को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। अब वरिष्ठ सचिव समिति ने संशोधित नियमों के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताते हुए नए सुझाव दिए हैं। इससे ड्राफ्ट पर फिर पेंच फंस गए हैं।
विडंबना यह है कि जिस प्रदेश में अवैध कॉलोनियों की संख्या 8 हजार के पार पहुंच चुकी है, वहां इन्हें रोकने के लिए प्रस्तावित नियम ही लंबे समय से फाइलों में उलझे हैं। मौजूदा प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन में भी नगरीय निकाय नाकाम रहे हैं। ऐसे में नए नियमों में देरी से अवैध कॉलोनियों की चुनौती और बढ़ रही है। वरिष्ठ सचिव समिति ने कई प्रावधानों में पुनर्विचार के सुझाव दिए हैं। इस पेंच के बीच विभाग अब समिति के सुझावों के मुताबिक ड्राफ्ट में संशोधन करेगा। इसके बाद इसे दोबारा समिति के सामने रखा जाएगा। मंजूरी मिलने के बाद ही आगे की प्रक्रिया शुरू हो सकेगी।
प्रस्तावित नियमों में अवैध कॉलोनी विकसित करने वालों के लिए अधिकतम 10 साल की सजा और पांच करोड़ रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है। वहीं, मौजूदा नियमों में भी अधिकतम सात साल तक की सजा का प्रावधान बताया गया है। समिति में सजा बढ़ाने के प्रस्ताव पर इसलिए भी विचार हुआ, क्योंकि सरकार ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के तहत कई कानूनों में जेल की सजा के स्थान पर आर्थिक दंड को प्राथमिकता दे रही है। इस दिशा में दो जनविश्वास अधिनियम भी लागू किए जा चुके हैं।
नगरीय विकास विभाग के पास अवैध कॉलोनियों का अद्यतन आंकड़ा भी नहीं है। विभाग ने वर्षों पहले 7,981 अवैध कॉलोनियां चिह्नित की थीं। अब इनकी संख्या आठ हजार से अधिक होने का अनुमान है, लेकिन इसके बाद व्यापक सर्वे नहीं हुआ। नगर निगमों की तुलना में नगर पालिका और नगर परिषद क्षेत्रों में ऐसी कॉलोनियों की संख्या अधिक बताई जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों का अलग से पूरा आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है।
विभाग का प्रस्ताव है कि अवैध कॉलोनियों को रोकने के लिए शहरों के साथ ग्रामीण और कैंटोनमेंट क्षेत्रों में भी एक समान कानून लागू किया जाए। वरिष्ठ सचिव समिति में इस पर सवाल उठे हैं। सदस्यों का मानना है कि गांवों और शहरों की परिस्थितियां अलग हैं। एक जैसे नियम लागू होने से ग्रामीण
क्षेत्रों में जमीन की खरीद-बिक्री और उस पर मकान बनाने में आम लोगों को परेशानी हो सकती है। समिति ने दूसरे राज्यों में अवैध कॉलोनियों पर अंकुश लगाने के लिए बनाए गए कानूनों का अध्ययन करने और ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी कॉलोनियों का डेटा जुटाने के सुझाव भी दिए हैं।
कड़ी सजाः अवैध कॉलोनी विकसित करने पर अधिकतम 10 साल की सजा और पांच करोड़ रुपए तक जुर्माना।
विकास कार्य अनिवार्यः कॉलोनाइजर को पांच साल में सड़क, बिजली, पानी और सीवेज सहित जरूरी सुविधाएं विकसित करनी होंगी।
डिजिटल निगरानीः कॉलोनियों का ऑनलाइन रिकॉर्ड रखा जाएगा, ताकि खरीदार संपत्ति लेने से पहले उसकी वैधता जांच सकें।
15 दिन का नोटिसः अवैध कॉलोनी हटाने के लिए नोटिस: कार्रवाई नहीं होने पर निकाय ध्वस्तीकरण कर जमीन अपने कब्जे में ले सकेगा।
अधिकारियों की जवाबदेहीः कलेक्टर, निगम आयुक्त, पार्षद और सरपंच सहित संबंधित जिम्मेदारों की भूमिका तय होगी। कार्रवाई में देरी पर अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रस्ताव है।
समय-सीमा में कार्रवाई: अवैध कॉलोनियों के खिलाफ कार्रवाई के प्रत्येक चरण के लिए समय-सीमा निर्धारित करने का प्रावधान