कानूनी मामलों से निपटने के लिए किया शामिल
भोपाल/ लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने गर्भधारण पूर्व और प्रसूति पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिशोध) अधिनियम (पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट) के अंतर्गत राज्य सलाहकार समिति का पुनर्गठन किया है। समिति में स्त्री रोग और शिशु रोग विशेषज्ञ के साथ विधि विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है। इस एक्ट के तहत कार्रवाई के दौरान कई बार विधि संबंधी प्रश्न खड़ा हो जाता है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए विधि विशेषज्ञ मदद करेंगे।
पुनर्गठित समिति में स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ प्राध्यापक स्त्री रोग विभाग, एमजीएम कॉलेज, इंदौर की डॉ. पूनम माथुर, शिशु रोग विशेषज्ञ पूर्व वाइस चांसलर एवीबी, इंदौर डॉ. भरत छपरवाल, मेडिकल जेनेटिक्स में सेवानिवृत्त प्राध्यापक, एनाटामी, एमजीएम कॉलेज, इंदौर के डॉ. व्ही.के. पंडित, विधि विशेषज्ञ उप सचिव, विधि विभाग और जनसम्पर्क संचालनालय के जनसम्पर्क अधिकारी को शामिल किया गया है।
इस समिति में 3 सोशल वर्कर भी शामिल किये गये हैं। ये विशेषज्ञ हैं एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर, एमपीवीएचए मुकेश सिन्हा, महिला शिक्षा वैज्ञानिक चेतना की आशा मिश्रा और शासकीय अधिवक्ता, हाईकोर्ट, जबलपुर एवं महिलाओं के वैधानिक अधिकारों के लिये सक्रिय अंजना कुरारिया।
पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट 1994 भारत में कन्या भ्रूण हत्या और गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए संसद द्वारा पारित एक कानून है। इस अधिनियम से प्रसव पूर्व निर्धारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक ‘पीएनडीटी’ एक्ट 1996, के तहत जन्म से पूर्व शिशु के लडका या लडकी की जांच पर पाबंदी है। लडका या लडकी इसका परीक्षण के लिए अल्ट्रासाउंड या अल्ट्रासोनोग्राफी कराने वाले जोड़े या करने वाले डाक्टर, लैब कर्मी को तीन से पांच साल सजा और 10 से 50 हजार जुर्माने की सजा का प्रावधान है।
प्रत्येक आनुवांशिक परामर्श केंद्र, आनुवांशिक प्रयोगशाला या आनुवांशिक क्लिनिक परामर्श देने या प्रसव पूर्व निदान तकनीकों का संचालन करने में लगे हुए हैं, जैसे कि गर्भाधान से पहले और बाद में लडका या लडकी इसका चयन की संभावनाओं के साथ इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ) पीसीसीपीटी अधिनियम के दायरे में आता है और इस पर प्रतिबंध है।