
भोपाल : मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भले ही भाजपा को सलाह दी हो कि उसे उम्मीदवार तय करने के लिए विज्ञापन निकालना चाहिए लेकिन कांग्रेस में भी कुछ इसी तरह के हालात हैं। भाजपा अब तक १८ उम्मीदवार घोषित कर चुकी है तो कांग्रेस महज ९ प्रत्याशियों के नाम का ऐलान ही कर पाई है। भाजपा के लिए ११ सीटों पर तो कांग्रेस के लिए २० सीटों पर पेंच फंसा हुआ है।
चुनौती पूर्ण चुनाव को देखते हुए दोनों दल फंूक-फंूक कर कदम उठा रहे हैं। बड़े शहरों में हालात ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं। स्थिति संकटपूर्ण इसलिए भी कही जा सकती है क्योंकि कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने गढ़ों में भी प्रत्याशी तय नहीं कर पाए हैं। कांग्रेस कई दौर की स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में एक नाम पर सहमति बनाने में नाकामयाब रही तो भाजपा सीईसी की बैठकों के बाद भी उम्मीदवार तय नहीं कर सकी।
- गढ़ में भी तय नहीं नाम :
भोपाल : ये सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती है,तीस सालों से यहां कांग्रेस जीत को तरस रही है। कांग्रेस ने बड़ा दांव खेला और दिग्विजय सिंह को मैदान में उतार दिया। दिग्विजय के नाम की घोषणा होते ही भाजपा में मंथन शुरु हो गया। मंथन में कभी शिवराज सिंह चौहान तो कभी उमाभारती का नाम निकला लेकिन नाम तय नहीं हो पाया। अब नरेंद्र सिंह तोमर के नाम की भी चर्चा होने लगी है। भाजपा यहां से छोटे नेता को उतारकर जोखिम नहीं लेना चाहती।
जबलपुर : भाजपा भोपाल से उम्मीदवार तय नहीं कर पा रही तो कांग्रेस के पास जबलपुर में सूखा पड़ा है। १५ साल से कांग्रेस यहां भी जीत को तरस रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को उम्मीदवार घेाषित कर चुकी है लेकिन कांग्रेस के पास अभी भी कोई जिताउ चेहरा नजर नहीं आया है। राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ही अब कांग्रेस को खेवनहार के रुप में नजर आ रहे हैं,लेकिन मंथन अभी भी पूरा नहीं हुआ।
इंदौर : ये भाजपा का सबसे बड़ा गढ़ और कांग्रेस के लिए सबसे कठिन सीट मानी जा सकती है। यहां से ९ बार की सांसद सुमित्रा महाजन पर भी पेंच फंस गया है। एक बार फिर ये सीट ताई-भाई के पेंच में फंस गई है। महाजन यहां से फिर टिकट चाहती हैं तो भाजपा ७५ पार के फॉर्मूले पर काम करना चाहती है। इसी रस्साकसी में नाम फंसा हुआ है। कांग्रेस के लिए इंदौर भी अबूझ पहेली बना हुआ है, यहां जिताउ उम्मीदवार कांग्रेस के पास नहीं दिखाई देता।
गुना : ये सिंधिया परिवार की परंपरागत सीट है। पिछले चार बार से ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार इस सीट से चुनाव जीत रहे हैं। भाजपा के इंदौर की तरह कांग्रेस की गुना सीट पर भी पेंच फंसा है। विधानसभा चुनाव में गुना और शिवपुरी की हार ने सिंधिया के माथे पर सलवटें ला दी हैं। सिंधिया ग्वालियर से चुनाव लडऩे का मन बना रहे हैं तो संगठन उनको गुना से ही चुनाव लड़वाना चाहता है। नतीजा यहां भी नहीं निकल पा रहा है। यहां से भाजपा ऐसा उम्मीदवार नहीं तलाश पा रही जो सिंधिया को टक्कर दे सके। जयभान सिंह पवैया भी विधानसभा चुनाव हार चुके हैं।
छिंदवाड़ा : कांग्रेस का अभेद गढ़ होने के बाद भी वो यहां से अपना उम्मीदवार तय नहीं कर पाई है। कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके पुत्र नकुलनाथ का यहां से उम्मीदवार बनना तय है लेकिन देरी का कारण कयासों को जन्म दे रहा है। हालांकि कमलनाथ कार्यकर्ताओं के बीच इस बात के संकेत दे चुके हैं कि नकुलनाथ ही उम्मीदवार होंगे। भाजपा के लिए छिंदवाड़ा हमेशा सबसे कठिन सीट रही है, भाजपा यहां पर भी दमदार प्रत्याशी उतारने का मन बना रही है।
सीधी : भाजपा ने यहां से सांसद रीति पाठक को फिर से मौका दिया है। जाहिर है खराब रिपोर्ट कार्ड के बाद भी भाजपा के पास रीति का विकल्प नहीं था। इस सीट पर कांग्रेस की ओर से अजय सिंह का नाम तय है लेकिन घोषित नहीं हुआ। सीधी की टेढ़ी राजनीति से पार पाना कांग्रेस के लिए इतना आसान नहीं जितना नजर आ रहा है। ये माना जा सकता है कि विंध्य के मामले में अभी सबकुछ ठीक नहीं है।
रतलाम : कांग्रेस के इस गढ़ में भाजपा को संकट है। भाजपा के पास कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया के मुकाबले कोई उम्मीदवार नहीं है। कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया का नाम घोषित कर दिया है लेकिन भाजपा में अभी तलाश जारी है। कांग्रेस से आयातित दिलीप सिंह भूरिया ने भले ही २०१४ में कांतिलाल से सीट छीन ली लेकिन उनके निधन के बाद फिर से ये सीट कांतिलाल के खाते में चली गई और दिलीपसिंह की बेटी निर्मला अपने पिता का कारनामा नहीं दोहरा पाईं। निर्मला विधानसभा चुनाव हार चुकी हैं लिहाजा पार्टी को विकल्प की तलाश है।
- तीन-चार दिन में कांग्रेस के अधिकांश उम्मीदवार तय हो जाएंगे। पार्टी को कहीं कोई मुश्किल नहीं,रणनीति के हिसाब से काम किया जा रहा है। - कमलनाथ मुख्यमंत्री
- भाजपा पूरी २९ सीटें जीतने के लिए चुनाव लड़ रही है। टिकट तय करना चुनाव समिति का अधिकार है।
- शिवराज सिंह चौहान पूर्व मुख्यमंत्री -