
भोपाल। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की आज यानि 31 अक्टूबर को जंयती है। इस अवसर पर मध्यप्रदेश सहित देशभर में राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जा रहा है। दरअसल स्वतंत्रता संग्राम से लेकर मजबूत और एकीकृत भारत के निर्माण तक में सरदार वल्लभभाई पटेल का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने युवावस्था में ही राष्ट्र और समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया था। वह इस उद्देश्य पथ पर वह नि:स्वार्थ भाव से लगे रहे।
MP में ऐसे मनाई जयंती...
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के अन्य जिलों में लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस अवसर पर 31 अक्टूबर को राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के जिलों में एकता के लिए दौड़ (रन फॉर यूनिटी) का आयोजन किया गया।
राजधानी भोपाल में 'राष्ट्रीय एकता दौड़' का शुभारंभ टीटी नगर स्टेडियम से प्रातः 9.30 बजे हरी झंडी दिखाकर किया गया।
वहीं दौड़ का समापन वल्लभ भवन (मंत्रालय) स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल पार्क पर हुआ,जहां दौड़ में शामिल नागरिकों को राष्ट्रीय एकता की शपथ दिलायी गई।
मध्यप्रदेश में 31 अक्टूबर को लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती को बीजेपी एकता दिवस के रूप में मनाई जा रही है। भोपाल सहित प्रदेश के अनेक शहरों में इसका आयोजन की हुआ। इस मौके पर रन फॉर यूनिटी, विचार गोष्ठी व सेमिनार के आयोजन किए गए।
भोपाल में प्रदेश बीजेपी प्रभारी प्रभारी डॉ. विनय सहस्रबुद्धे जबकि सागर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और जबलपुर में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पुरूषोत्तम भाई रूपाला ने भाग लिया। सहस्रबुद्धे ने सुबह 8 बजे सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती पर भोपाल के टीटी नगर स्टेडियम से एकता दौड़ (रन फार यूनिटी) के बाद 10 बजे सरदार पटेल की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।
इसके बाद सुबह 11 बजे प्रदेश बीजेपी दफ्तर में एक भारत 'श्रेष्ठ भारत' विषय पर संगोष्ठी हुई जिसमें वह मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। इसके अलावा प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर एकता दिवस पर लौह पुरूष पटेल का स्मरण करने के साथ सभाएं व गोष्ठियां भी आयोजित की गई।
टेलीग्राम में लिखी थी पत्नी के निधन की बात
सरदार पटेल ने आजीवन पूरी कुशलता, क्षमता के साथ दायित्व का निर्वाहन किया। जब वह वकील के दायित्व का निर्वाह कर रहे थे, तब उसमें भी मिसाल कायम की। जब वह जज के सामने जिरह कर रहे थे, तभी उन्हें एक टेलीग्राम मिला, जिसे उन्होंने देखा और जेब में रख लिया। उन्होंने पहले अपने वकील धर्म का पालन किया, उसके बाद घर जाने का फैसला लिया। जबकि इस टेलीग्राम में उनकी पत्नी के निधन की सूचना थी।
ऐसा नहीं कि उनके लौहपुरुष होने का उदाहरण आजादी के बाद उनके कार्यों से ही मिला, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व की बड़ी विशेषता थी। इसका प्रभाव उनके प्रत्येक कार्य में साफ दिखाई देता था।
गांधी भी मानते थे इनका लोहा :
महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के साथ ही कांग्रेस में एक बड़ा बदलाव आया था। इसकी गतिविधियों का विस्तार सुदूर गांव तक हुआ था, लेकिन इस विचार को व्यापकता के साथ आगे बढ़ाने का श्रेय सरदार पटेल को दिया जा सकता है उन्हें भारतीय सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की भी गहरी समझ थी। वह जानते थे कि गांवों को शामिल किए बिना स्वतंत्रता संग्राम को पर्याप्त मजबूती नहीं दी जा सकती।
वारदोली सत्याग्रह के माध्यम से उन्होंने पूरे देश को इसी बात का संदेश दिया था। इसके बाद भारत के गांवों में भी अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद होने लगी थी। देश में हुए इस जनजागरण में सरदार पटेल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। इस बात को महात्मा गांधी भी स्वीकार करते थे। सरदार पटेल के विचारों का बहुत सम्मान किया जाता था। वहीं उनकी लोकप्रियता भी बहुत थी, स्वतंत्रता के पहले ही उन्होंने भारत को शक्तिशाली बनाने की कल्पना कर ली थी।
संविधान निर्माण में भी योगदान :
संविधान निर्माण में भी उनका बड़ा योगदान था। इस तथ्य को डॉ. अंबेडकर भी स्वीकार करते थे। सरदार पटेल मूलाधिकारों पर बनी समिति के अध्यक्ष थे। इसमें भी उनके व्यापक ज्ञान की झलक मिलती है। उन्होंने ही अधिकारों को दो भागों में रखने का सुझाव दिया था, एक मूलाधिकार और दूसरा नीति-निर्देशक तत्व...
यहां मूलाधिकार में मुख्यत: राजनीतिक, सामाजिक, नागरिक अधिकारों की व्यवस्था की गई। जबकि नीति निर्देशक तत्व में खासतौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ध्यान दिया गया। इसमें कृषि, पशुपालन, पर्यावरण, जैसे विषय शामिल हैं। इन्हें आगे आने वाली सरकारों के मार्गदर्शक के रूप में शामिल किया गया। बाद में न्यायिक फैसलों में भी इसकी उपयोगिता स्वीकार की गई।
सरदार पटेल भारत की मूल परिस्थिति को गहराई से समझते थे। वह जानते थे कि जब तक अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण बना रहेगा, तब तक संतुलित विकास होता रहेगा. इसके अलावा गांव से शहरों की ओर पलायन नहीं होगा। गांव में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। आजादी के बाद भारत को एक रखना बड़ी समस्या थी।
जानकारों के अनुसार अंग्रेज जाते-जाते अपनी कुटिल चाल चलते हुए साढ़े पांच सौ से ज्यादा देशी रियासतों को वह अपने भविष्य के निर्णय का अधिकार दे गए थे।
उनका यह कुटिल आदेश एक षड्यंत्र जैसा था। वह दिखाना चाहते थे कि भारत अपने को एक नहीं रख सकेगा। देश के सामने आजाद होने के तत्काल बाद इतनी रियासतों को एक रखने की चुनौती सामने थी। ऐसे में सरदार पटेल ने बड़ी कुशलता से एकीकरण का कार्य संपन्न कराया। इसमें भी उनका लौहपुरुष व्यक्तित्व दिखाई देता है।
एकीकरण के लिए उन्होंने देशी रियासतों की कई श्रेणियां बनाईं। सभी से बात की। अधिकांश को सहजता से शामिल किया। वहीं कुछ के साथ कठोरता भी दिखानी पड़ी। इस कार्य के लिए वे सेना का सहारा लेने से भी वह पीछे नहीं हटे। देश की एकता को उन्होंने सर्वोपरि माना। आजादी के बाद उन्हें केवल तीन वर्ष ही देश सेवा का अवसर मिला, इसी अल्प अवधि में उन्होंने कई बेमिसाल कार्य किए।