कांग्रेस-भाजपा की चालों पर नजर...
भोपाल। लोकसभा चुनावों को लेकर जहां एक ओर भाजपा व कांग्रेस दोनों ने ही अब तक मध्यप्रदेश सभी सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित नहीं किए हैं। वहीं माना जा रहा है कि दोनों ही पार्टियां दूसरे के प्रत्याशी की घोषणा के बाद ही कोई कदम उठाना चाहती है।
वहीं प्रदेश में कांग्रेस ने कठिन सीट पर चुनाव लड़ने के चलते दिग्विजय सिंह को भोपाल सीट से उतार कर भाजपा के लिए एक बड़ी परेशानी खड़ी कर दी है।
लेकिन इतना सब होने के बावजूद सिंधिया को लेकर कठिन सीट का मुद्दा कांग्रेस में काफी मजबूती से नहीं चल सका। इस संबंध में जानकार मानते हैं कि कठिन सीट के लहजे से सिंधिया कांग्रेस में फायदे में हैं।
इसका कारण यह है कि मध्यप्रदेश की प्रमुख चार कठिन सीटों में से दो पर सिंधिया राजपरिवार की खास पकड़ है, जबकि एक अन्य रिजर्व सीट है।
ऐसे में कांग्रेस में उनके विरोधी उन्हें कठिन सीट के नाम पर उकसाना नहीं चाहते, माना जा रहा है यदि सिंधिया कठिन सीट के नाम पर भी अपनी ग्वालियर व गुना सीट छोड़कर कहीं और से खड़े होते हैं, तो भी वे अपनी जीत दर्ज करा सकते हैं। लेकिन इससे वे कांग्रेस में और बढ़े कद के साथ उभरेंगे, जिसको उनके विरोधी आसानी से पचा पाने की स्थिति में नहीं होंगे।
जानिये पूरा मामला...
जानकारों की मानें तो मध्यप्रदेश में कांग्रेस की ओर से कठिन सीट के नाम पर दिग्विजय सिंह को भोपाल से उतार कर बली का बकरा बनाने की कोशिश में जुटे कांग्रेसियों ने जानबुझकर सिंह के पर कुतरने के लिए ये चाल चली। वहीं यही चाल वे सिंधिया पर चलने में नाकामयाब रहे, क्योंकि कठिन सीटों में मुख्य रूप से भोपाल, विदिशा, इंदौर व भिंड मानी जाती हैं।
इनमें से दो इंदौर व विदिशा सिंधिया परिवार से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में सिंधिया से अपने टकराव के चलते ही दिग्विजय ने भोपाल सीट को चुना। वहीं कठिन सीट चयन के लिए स्वयं की इच्छा दिए जाने से इस जगह सिंधिया हावी रहे, क्योंकि जरूरत पड़ने पर वे इंदौर या विदिशा दोनों में से किसी एक को चुनने के लिए स्वतंत्र होते।
और यदि ये पासा विरोधियों द्वारा सिंधिया पर फेंका जाता तो इसके उल्टा पड़ने का अधिक चांस लिए था, यानि इससे विरोधियों के ही परास्त होने की अधिक संभावना थी। जानकारों के अनुसार इसी कारण कठिन सीट वाला मुद्दा सिंधिया पर नहीं थोपा गया।
कांग्रेस की मंशा!
कांग्रेस से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अब कांग्रेस भाजपा की चालों पर नजर बनाने के साथ ही उनके प्रत्यशियों की सूची का इंतजार कर रही है। दरअसल चर्चा है कि कांग्रेस इस बार सिंधिया को भी कठिन सीट का लक्ष्य दे सकती है। जिसके चलते वे विदिशा से चुनाव लड़ सकते हैं।
जानकारों की माने तो ऐसा लगता है कांग्रेस अभी भाजपा के ग्वालियर, गुना प्रत्याशियों का इंतजार कर रही है। उनकी सूची सामने आते ही यदि ग्वालियर में ज्यादा पेंच नहीं फंसा तो ग्वालियर से फूल सिंह बरैया, वहीं गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शनी राजे को टिकट दिया जा सकता है। जिसके बाद सिंधिया स्वयं विदिशा से चुनाव लड़ सकते हैं।
वहीं यदि गुना या ग्वालियर में पेंच फंसता है तो जरूर सिंधिया उस पेंच वाली सीट से चुनाव लड़ेंगे। वहीं यदि ये पेेंच की स्थिति गुना में पैदा हुई तो प्रियदर्शनी ग्वालियर से व ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से चुनाव लड़ेंगे। इसके अलावा यदि ये पेंच ग्वालियर में फंसा तो ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर व प्रियदर्शनी राजे गुना से चुनाव लड़ेंगे।
वहीं यदि सब ठीक रहा तो गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शनी राजे को टिकट दिया जा सकता है। जबकि सिंधिया स्वयं विदिशा से चुनाव लड़ सकते हैं। वहीं ऐसी स्थिति में चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस में शामिल हुए फूल सिंह बरैया को ग्वालियर से टिकट दिया जा सकता है।
राजनीति के जानकार डीके शर्मा के अनुसार कांग्रेस की स्थिति को देखकर साफ लगता है कि वो मध्यप्रदेश से ज्यादा से ज्यादा सीटें अपने कब्जे में करना चाहती है।
ऐसे में वह व्यक्ति के प्रभाव का इस्तेमाल कर जहां विरोधियों को कमजोर कर सकती है, वहीं उनके गढ़ों में भी सेंध लगाकर उनके लिए परेशानी पैदा कर सकती है, जिससे उनके सारे बड़े नेता अपने उस गढ़ को बचाने के लिए जमा हो जाएं ओर दूसरे क्षेत्रों की ओर ध्यान न दे सकें, ताकि कांग्रेस दूसरी जगहों पर भी जीत दर्ज कर सके।
शर्मा के अनुसार ऐसा कांग्रेस ही नहीं कर रही है, खुद भाजपा भी काफी हद तक इसी रणनीति का इस्तेमाल करते दिख रही है। वह भी अब तक ग्वालियर, गुना व विदिशा में अपने प्रत्याशी की घोषणा नहीं कर सकी है।
ऐसे में ये मानना गलत नहीं होगा कि भाजपा भी ये जानना चाहती है कि कांग्रेस कहा कमजोर पड़ रही है। वहीं से हम अपनी पूरी ताकत लगाएं।