वल्र्ड थिएटर डे आज
भोपाल। रंगमंच, नाट्यकला या थियेटर समाज के सामने कला के माध्यम से अपनी बात रखने का एक जरिया है। फिर इसे सच कहे या काल्पनिक लेकिन यही रंगमंच है। कोई भी डेढ़-दो घंटे का नाटक देखने के बाद आपको जो खुशी मिलती है उसके पीछे एक पूरी टीम की मेहनत होती है।
रंगमंच का मतलब सिर्फ एक्टिंग करना ही नहीं है बल्कि इससे भी कहीं अधिक है। नाटक-गीत लिखना, म्यूजिक, सेट, कॉस्ट्यूम और लाइट डिजायन करने से लेकर बहुत सारे ऐसे काम हैं जो रंगकर्म के अंतर्गत आते हैं। आज वल्र्ड थिएटर डे के अवसर पर हम आपको बैक स्टेज के ऐसे ही कुछ हीरोज से मिलवा रहे हैं, जो एक सही मायने में एक नाटक को आकार देते हैं।
हर सीन को विजुअलाइज करना पड़ता है
मैं 18 सालों से इस प्रोफेशन से जुड़ी हूं। दूरदर्शन में भी बतौर मेकअप आर्टिस्ट जुड़ी हूं। 18 साल पहले जब थिएटर से जुड़ी तब मेकअप आर्टिस्ट को इतना महत्व नहीं मिलता था। भले ही इसमें अन्य काम की तरह इनकम नहीं हो, लेकिन थिएटर के लिए मेकअप करना दिल को सुकुन देता है।
मैं दो बार लोक रंग के लिए भी मेकअप कर चुकी हूं। हर नए नाटक के साथ नई चुनौतियां होती है। डायरेक्टर से कहानी सुनने के बाद कैरेक्टर को विजुअलाइज करना होता है। ऐतिहासिक और थीम बेस्ड नाटक में सोचना पड़ता है कि कैरेक्टर पर किस तरह का मेकअप करना होगा, छोटी सी गलती कैरेक्टर को ओवर एक्सपोज कर देगी।
पूरी सीन ही बिगड़ जाएगा। फोकस लाइट, सन लाइट, डे लाइन, अंडर स्टूडियो के हिसाब से मेकअप करना बड़ा टास्क होता है। आज जब थिएटर के बड़े आर्टिस्ट मुझसे मेकअप कराने की बात कहते हैं तो दिल से खुशी होती है। मुझे जैन समाज से बेस्ट मेकअप आर्टिस्ट का अवॉर्ड भी मिल चुका है।
- सपना जैन, मेकअप आर्टिस्ट
थिएटर आर्टिस्ट की मेहनत देख छह साल में 200 शो में बने दर्शक
मैं पेशे से शिक्षक और एस्ट्रोलोजर हूं। थिएटर से लगाव तो था लेकिन व्यस्तता के कारण शो देखने नहीं जा पाते थे। करीब छह साल पहले मैं और मेरे पति एक शो देखने पहुंचे। शो इतना अच्छा लगा कि बेटे काव्य को भी इससे जोडऩे का फैसला लिया।
जब बेटे और टीम को मेहनत करते हुए देखा तो लगा कि आर्टिस्ट अपने काम के लिए प्रति बहुत पेशनेट होते हैं। समाज को आइना दिखाने के लिए वह बहुत मेहनत करते हैं। यह देख अफसोस हुआ कि उनकी इस मेहनत के कद्रदान कम ही हैं। तभी हमने फैसला लिया कि ज्यादा से ज्यादा शो देखने जाएंगे। ठंड हो या बारिश, हम शो कम ही मिस करते हैं। पिछले छह साल में भारत भवन, रवीन्द्र भवन और शहीद भवन में करीब 200 शो देख चुके हैं। थिएटर समाज को नई दिशा देने का काम करता है। थिएटर देख हमारी जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आए हैं।
सुषमा पुरोहित, दर्शक
शो के बाद जब दर्शक सेट की तारीफ करते हैं तो बैक स्टेज के हर आर्टिस्ट को खुशी होती है
मैं पिछले 20 सालों से थिएटर से जुड़ा हूं। थिएटर से मुझे इतना लगाव है कि मैंने कभी इसके लिए अलावा किसी के बारे में सोचा ही नहीं। इसलिए मैंने शहीद भवन में टेक्निकल स्टाफ में नौकरी भी ज्वॉइन की।
अब तक करीब 60 शो में सेट डिजाइनिंग कर चुका हूं। इस साल लोकरंग से भी जुड़ा था। बचपन में बाल भवन में होने वाले शो देख थिएटर से जुडऩे का खयाल आया। शुरू में एक्टिंग की, लेकिन बाद में लगा कि एक्टर तो हर कोई बनना चाहता है, लेकिन बैक स्टेज में कम ही आर्टिस्ट काम करना चाहते हैं।
शो के बाद जब दर्शक आकर पूछते हैं कि सेट बहुत अच्छा डिजाइन हुआ है तो पूरी टीम को दिल से खुशी होती है। ऑडियंस का यही प्यार थिएटर से जोड़े रखता है। सेट डिजाइनिंग काफी टफ टास्क होता है। हर शो में आपको अपनी सारी कल्पनाशीलता झोकना पड़ती है।
देवेन्द्र शर्मा, सेट डिजाइनर