
MP News : ट्विशा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के मामले में बुधवार को जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पूर्व जिला न्यायाधीश गिरिबाला सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी ने 26 अक्टूबर को पारित आदेश में कहा कि मृतका की मौत से पहले की परिस्थितियां, स्वजनों से हुई व्हाट्सएप बातचीत, सीसीटीवी फुटेज और आरोपितों की भूमिका की आगे जांच जरूरी है। कोर्ट ने माना कि, गिरिबाला सिंह को जमानत पर रिहा करना ठीक नहीं है। गिरिबाला सिंह 2 जून 2026 से जेल में हैं।
हाईकोर्ट ने मृतका की मां और ननद के साथ हुई व्हाट्सएप बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि, 9 मई के संदेशों में ट्विशा ने पति द्वारा बच्चे के पितृत्व पर सवाल उठाने और गर्भपात को लेकर आरोप लगाने की शिकायत की थी। उसने मानसिक रूप से परेशान होने और आत्महत्या जैसे विचार आने की बात भी कही थी। 11 मई को भी उसने ससुराल में घुटन और प्रताड़ना की शिकायत की थी।
बता दें कि, 12 मई को ट्विशा शर्मा ने अपनी मां से 3 हजार रुपए मंगाकर नसीराबाद लौटने के लिए ट्रेन टिकट बुक किया था। उसने पति के साथ दांपत्य परामर्श के लिए डॉक्टर के पास जाने की बात भी कही थी। रात करीब 9:20 बजे उसने अपनी ननद को फोन पर रोते हुए पति के आक्रामक व्यवहार की बात भी कही थी। जबकि, 9:36 बजे भेजे संदेश में उसने कहा था कि, उसे शांति से मरने दिया जाए। इसके बाद भी उसने पिता और मां से फोन पर बात की और पति के हिंसक व्यवहार के आरोप लगाए थे।
कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज का जिक्र करते हुए कहा कि, रात करीब 10:23 बजे गिरिबाला सिंह को पहली मंजिल से छत पर दिखाई दी थीं।उनके पीछे गिरिबाला का बेटा समर्थ भी छत पर गया था। बाद में गिरिबाला सिंह नीचे मुख्य दरवाजा खोलने आईं। फुटेज में समर्थ सिंह, उसके चचेरे भाई स्वराज सिंह और घरेलू सहायक प्रमोद कुमार झारिया मृतका को सीढ़ियों से नीचे लाते दिखे थे। कोर्ट ने इन परिस्थितियों को भी खास माना है।
मृतका के आईफोन से डेटा निकालने की रिपोर्ट अभी प्राप्त नहीं हुई थी। घर के सीसीटीवी रिकॉर्ड के डेटा की प्रामाणिकता और निरंतरता जांचने के लिए इसे केंद्रीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया था। फिलहाल, रिपोर्ट आना बाकी है। कोर्ट ने कहा कि, इन रिपोर्टों से भी खास तथ्य सामने आ सकते हैं। अगर रिकॉर्ड में बदलाव मिलता है तो आगे जांच की जरूरत पड़ेगी।
गिरिबाला सिंह के वकीलों की दलील थी कि, आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में स्पष्ट इरादा जरूरी है और सिर्फ प्रताड़ना के आरोप पर्याप्त नहीं हैं। इसपर कोर्ट ने कहा कि, इरादे के सवाल को इस स्तर पर अन्य परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। मामले के तथ्य पहले में उद्धृत फैसले से अलग हैं और आरोपियों की भूमिका की आगे जांच जरूरी है।