MP News: अगर आलोचना सुनते ही गुस्सा आ जाता है, हर समय प्रशंसा की चाह रहती है और खुद को सबसे बेहतर मानते हैं, तो यह सामान्य आत्मविश्वास नहीं भी हो सकता।
MP News: क्या आप अपनी आलोचना सुनते ही भड़क जाते हैं। अपनी ही बात पर अड रहते हैं। अपनी कमियों को छुपाकर सोशल मीडिया पर खुद को अच्छा दिखाने की आदत से मजबूर है। क्या आप चाहते हैं कि सभी सिर्फ आपकी प्रशंसा करें और महत्व नहीं मिलने पर आपको क्रोध आता है। यदि इसका उत्तर हां है, तो सावधान हो जाइए। आप मानसिक विकार नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (Narcissistic Personality Disorder) के गिरफ्त में आ रहे हैं। शीघ्र ही किसी मनोवैज्ञानिक से संपर्क कीजिए। समय पर उपचार से यह ठीक हो रहा है।
मध्य प्रदेश में कोरोना काल में ऐसे मामले सामने आने शुरू हुए थे। अब ऐसे मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हर आत्मविश्वासी व्यक्ति नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से ग्रस्त नहीं होता है। इस मानसिक विकार और आत्मविश्वस में बहुत ही बारीक अंतर है। दोनों में अंतर केवल इतना है कि क्या व्यक्ति दूसरों की भावनाओं को समझ पाता है या नहीं। अगर कोई व्यक्ति आलोचना सहन नहीं कर पाता, हर चर्चा को अपने ऊपर केंद्रित कर देता है तो यह चेतावनी संकेत है।
केस 1 - 27 वर्षीय युवती पेशे से सोशल मीडिया क्रिएटर हैं। उसकी मानसिक स्थिति लाइक्स और तारीफ पर निर्भर है। सराहना कम होते ही उसकी बेचैनी और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। उसे लगता है कि वह सबसे अच्छा काम की है। लोगों को समझ में नहीं आ रहा है। बराबरी या भावनात्मक साझेदारी नहीं। आलोचना होने पर खुद को पीड़ित बताकर दूसरों को दोष देती है।
केस 2- 38 वर्षीय युवक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर हैं। वे अपने को सबसे योग्य मानते हैं। टीम की सफलताओं का श्रेय अकेले लेता है और जरा-सी आलोचना पर आक्रामक हो जाता है। सहकर्मियों की उपलब्धियों को कम आंकता है। घर में भी पत्नी और बच्चों की भावनाओं को कमजोरी कहकर नजरअंदाज करता है। भीतर से असुरक्षित अनुभव होने के बादजूद बाहर से खुद खुद को अत्यधिक आत्मविश्वासी दिखाता है।
केस 3- 35 वर्षीय युवक परिवार में हर निर्णय खुद लेना चाहता है। खुद को सब से नैतिक और बुद्धिमान व्यक्ति मानता है। बच्चों की बातों और भावनाओं को तुच्छ मानता है। उसकी बातों से असहमत होने पर आपसे बाहर हो जाता है। लोगों के दूरी बनाने पर वह अकेलेपन की शिकायत करता है, लेकिन अपने व्यवहार बदलने की जरूरत नहीं मानता।
मनोरोग विशेषज्ञों का मानना है कि बचपन में माता-पिता द्वारा बहुत अधिक लाड़-प्यार मिलना या बहुत अधिक उपेक्षा होने से यह विकार होता है। इसके अलावा यह अनुवांशिक कारणों के साथ ही मस्तिष्क की संरचना और सोचने के तरीके में अंतर से भी होता है।
एनपीडी से पीड़ित व्यक्ति खुद को मजबूत समझता है जबकि भीतर असुरक्षा, अकेलापन और डर छिपा होता है। यही वजह है कि वे इलाज या काउंसलिंग से बचते हैं।- डॉ. तन्मय जोशी,मनोचिकित्सक, एम्स भोपाल