
भोपाल। समाज को हमें समझना होगा, हम किसी को बताने नहीं जाएंगे, हमारा अपना अस्तित्व है। आप अपने लैंगिक रुझान के साथ होंगे लेकिन हम अपने लैंगिक रुझान के साथ हैं। भारतीय संविधान जितना आपको अपनी पसंदगी का अधिकार देता है, उतना ही हमें देता है। यह हमारे वजूद की लड़ाई है जिसे आपको समझना होगा। उन्होंने कहा कि किन्नर हवा से नहीं आते, वे भी इसी समाज के हिस्से हैं।
यदि आप एलजीबीटीक्यू समुदाय के किसी व्यक्ति को सम्मान दे रहे हैं तो इसके मायने यह सम्मान आपको मिल रहा है। यह बात रविवार को आवाज संस्था और बैठक द आर्ट हाउस द्वारा आयोजित रू-ब-रू शृंखला के तहत भिन्न लैंगिक रुझान और एलजीबीटीक्यू विषय पर अपनी बात रखने के दौरान संजना सिंह ने कही।
संजना ट्रांसजेंडर समुदाय से हैं और वर्तमान में सामाजिक न्याय विभाग के आयुक्त की निज सचिव के रूप में काम कर रही हैं। वे स्वच्छता अभियान के लिए मध्यप्रदेश सरकार की ब्रांड एम्बेसडर के रूप में भी काम करती रही हैं।
सभ्य समाज का क्रूरतम अपराध
इसके पहले इस विषय पर बात रखते हुए आवाज के निदेशक प्रशांत दुबे ने कहा कि 1861 के पहले भारत में समलैंगिक संबंध अपराध नहीं थे। उन्होंने कहा कि कई बार इन लैंगिक रुझानों को बीमारी भी माना जाता रहा है लेकिन 1973 में इसे अमेरिकी मनोचिकित्सक संघ ने माना कि यह कोई मानसिक बीमारी नहीं है।
उन्होंने बताया कि भोपाल में लगभग 15-20 अलग-अलग संबोधन हैं जिनसे एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों को संबोधित किया जाता रहा है। यह सभ्य समाज का क्रूरतम अपराध है कि जिस विषय पर हमारी समझ नहीं है उस पर हम अपनी सहूलियत से ताना-बाना बुनते हैं और उन्हें इन शब्दों से नीचा दिखाते रहते हैं।
विषय विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता वेणु पिल्लई ने एलजीबीटीक्यूआईए के संबंध में बात रखी। उन्होंने बताया कि तीन तरह की ही लैंगिक अभिव्यक्तियां हैं जैसे कि होमो सेक्सुअल, हेट्रो सेक्सुअल और बाय सेक्सुअल।